सादर अभिवादन
ब्लास्ट हो चुका है,
अब यह शहर
हाई अलर्ट पर रहेगा तीन-चार दिनों तक।
सारे तंत्र व्यस्त हो जाएंगे —
आकड़े छुपाने में,
और अपनी अहमियत दर्शाने में।
प्रेस कॉन्फ़्रेंस में चेहरों पर
गंभीरता की नक़ाबें चढ़ाई जाएंगी,
गिनते बैठे सिक्के वक्त बेवक्त
इस भरे बाजार में तन्हा हो गए।।
इतना रोए तेरे जाने के बाद अब
आंसू भी सूख कर ख़ाक हो गए।।
बसा ली हैं इतनी दूर बस्तियां
अपने ही गली कूचे में सब गैर हो गए।।
अचानक सारी खुशियाँ गुम हुई हैं
कि हासिद की नज़र है और मैं हूँ।
हवादिस ने हटाए सर से साएबस
इक सूखा शजर है और मैं हूँ।
ग़म ए दौराँ की तेरे हिज्र की भी
बहुत लम्बी डगर है और मैं हूँ।
आँखों पर पट्टी बाँध लेना
यानी सच को अनदेखा करना ।
यह नहीं है केवल बाह्य दृश्यों
नज़र बचाना,
बल्कि अक्षम होजाना है
ज्ञान-चक्षुओं का भी ।
मुँह मोड़ लेना है यथार्थ से ।
यूं लगातार सफेदपोश आतंक पर नेतागण बोल रहे हैं, लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं लेकिन ऐसा भी ज़ाहिर होता है कि मन में कुछ लावे की तरह दबा था जो अब खुलकर सामने बह रहा है। उनके भीतर से भी जिनकी बातें अंधेरे में मशाल की तरह मालूम होती थीं। उन्होंने लिखा -"सबका साथ सबका नहीं विकास /सहिष्णुता दिखा रही हिन्दू विनाश। "आतंक के साथ नफ़रत का जाल भी बिछा दिया गया है। एक अख़बार के संपादकीय पर अपनी टिप्पणी में शर्माजी लिखते हैं- "जिस दिन तुम या तुम्हारा कोई घरवाला ऐसी मौत मरेगा और जब तुम उनकी बॉडी के चीथड़े बटोरोगे तब ये क़लम जिससे तुम ये घृणित पोस्ट लिखते हो धिक्कारेगी तुमको।" एक पूरी कौम जो सफेदपोश होकर भी आतंक में जुटी है यह नैरेटिव किसी का भी भला नहीं कर सकता। क्यों कोई एक भी नेता यह नहीं कहता कि आपसी नफ़रत देश को कमज़ोर करती है ? पंजाब आतंक से मुक्त हुआ क्योंकि डीजीपी केपीएस गिल और मुख्यमंत्री बेअंत सिंह ने लोगों के बीच खो चुके भरोसे को कायम किया। हैरानी होती है जब कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह कहते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम का कोई ब्यौरा या सूचना उनसे साझा नहीं की गई। जबकि जम्मू-कश्मीर पुलिस की तत्परता ने ही इस आतंक के तार जोड़े। उमर अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं कि अगर गंभीरता बरती जाती तो दिल्ली में भी यह घटना होती ही नहीं ।


