सादर नमस्कार
मास नवंबर के सारे उत्सव छट से गए
मात्र 25 नवंबर को विवाह पंंचमी है
फिर प्रतीक्षा रहोगी आंग्ल नव वर्ष की
आज अद्यतन रचनाएं देखें ...
अंधेरे में बदल जाती हैं चीजें
जो है
वह नहीं दिखायी देता
जो नहीं है
वह नयी शक्लें धर लेता है
अंधेरा भय जगाता है
अंधेरा बाहर का हो या भीतर का
परिणाम वही रहता है
समय निर्बाध
तय करता रहा अपनी यात्रा
और..,
जीवन आकंठ डूबा रहा अपनी आपाधापी में
जी लेंगे अपनी जिन्दगी भी
फुर्सत मिलने पर…,
जैसे जीवन साल भर की
कतर-ब्योंत का बजट हो
कल खबर आई कि पकिस्तान में ननकाना साहिब गए 2100 भारतीय सिख श्रद्धालुओं का लाहौर में गर्मजोशी से स्वागत किया गया ! पंजाब प्रांत के मंत्री रमेश सिंह अरोड़ा और ETB का अधकारियों ने फूल बरसाए आज खबर आई कि पाकिस्तानी अधिकारीयों ने जत्थे के बारह सदस्यों को यह कह कर वापस लौटा दिया कि इस यात्रा की अनुमति सिर्फ सिख तीर्थयात्रियों को है, आप हिंदू हो, इसलिए आपको जाने नहीं दिया जाएगा ! आज तक जो कभी नहीं हुआ, वह हुआ ! साफ नजर आता है कि दोनों समुदायों में फूट डालने की नापाक कोशिश की गई !
न कागज़ चाहिए, न चाहिए कलम,
दिल ही काफी है लिखने को ग़म
हर एक जख्म में दास्ताँ लिखी है,
तुम जो पढ़ लो तो हो जाए कम
शीशे का दिल मेरा बिखर जायेगा
तोड दो, ताकि अब टूट जाये भरम
(जीवंत पेडीक्योर)
पेडीक्योर पैरों की देखभाल का एक तरीका है जिसमें पैरों को साफ करना,
मृत त्वचा हटाना और नाखूनों को ट्रिम करना शामिल है।
हम लोग झरने वाली नदी के किनारे आ गये जूते उतार कर पानी में पैर डाला ही था कि
पतिदेव ने एकदम झटके से पैर बाहर निकाला।
"मछलियाँ काट रही हैं।"
"अरे ऐसे कैसे?" मैंने भी पानी में पैर डाले और कुछ ही सेकेंड में पैरों में गुदगुदी सी होने लगी।
तीन-चार छोटी छोटी मछलियाँ पैरों की चमड़ी खा रही थीं।
"अरे ये तो फिश पेडीक्योर है" बहुत पहले इसके बारे में पढ़ा था। "पैर पानी में करे रहो
लोग इसके लिए हजारों रुपये देते हैं यहाँ फ्री में हो रहा है।"
पसीने से पैरों की त्वचा फूल गई थी और मछलियों की दावत हो रही थी। अहा कितना अच्छा लग रहा है। कभी-कभी छह सात मछलियां आ जाती और हमें पैर झटक कर बाहर निकालने पड़ते।
हम लगभग घंटे भर पेडीक्योर करवाते रहे। हमारा जाने का समय हो गया था पैर बाहर निकाले तो महसूस हुआ कि पैर कितने मुलायम और चिकने हो गये हैं। क्या सच में इतनी डेड स्किन होती है?
पता नहीं लेकिन पैर सच में बहुत अच्छे हो गये।
आज बस
सादर वंदन

