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गुरुवार, 4 सितंबर 2025

4501...यहाँ निर्देशक भी राह भटक जाते हैं...

शीर्षक पंक्ति आदरणीय  बलबीर सिंह राणा 'अडिग' जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में आज पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

भीड़ में कौन अलग नज़र आते हैं?

प्रयोजन होते सभी के पृथक, विलग,
पर! पाते वही जो स्वयं को खपाते हैं।

मद, सियासत लोलुपता चीज ही ऐसी,
यहाँ निर्देशक भी राह भटक जाते हैं।

*****

विनय-पत्रिका

पांचाली पर विपदा आई।

बात तुम्हें यह नहीं सुहाई।

आकर तुमने चीर बढ़ाया।

अधिकारों का पाठ पढ़ाया।

*****

ग़ज़ल-संग्रह समीक्षा : 'धूप के क़तरे'

ठिकाना ढूंढते हैं कुछ उजाले रूह के अंदर,

बदन पर जम रहे हैं मुद्दतों से धूप के क़तरे ।

एक और शेर देखें

निहाँ एक मुद्दत तेरे दिल के अंदर,

मेरी  ज़िंदगी की  कहानी  रही है।

इन अशआर से ही आपको परिश्रमी जी के तेवर और उनकी फ़िक्र का अंदाज़ा हो गया होगा।

ख़ुशख़बर आज  तेरी  आई है,

तुझको दिल से बहुत बधाई है।

*****

दहलीज़ से देहली तक: ध्वनि, अर्थ और भ्रम की कथा

'दहलीज़और 'ढेलजका भ्रम
एक आम ग़लतफ़हमी यह भी है कि उर्दू का 'दहलीज़और मराठी का 'ढेलजजैसे शब्द भी 'देहलीसे व्युत्पन्न हैं। ध्वनि व अर्थदोनों ही कारक यहाँ प्रबल हैंपर ऐसा नहीं है। ये दोनों अलग-अलग मूल के हैंपर अर्थगत साम्य की वजह से इन्हें 'देहली-ड्योढ़ीवाली शृङ्खला से सम्बन्धित मानना भी असहज नहीं है।

यद्यपि 'दहलीज़और 'ढेलजके स्रोत भिन्न हैंपर 'देहलीके साथ इनका अर्थगत व ध्वनि-साम्य इतना गहन है कि व्यवहार में ये एक-दूसरे के पर्याय बन जाते हैं।

*****

वकालत व्यवसाय में रहते हुए भी चरित्र पर कोई दाग नहीं था बाबू कौशल प्रसाद एडवोकेट के -आरिफ चौधरी एडवोकेट

ऐसे ही एक बार कैराना नियुक्त एक जज साहब माननीय अल्ला रक्खा खां ने अधिवक्ताओं की हड़ताल को मानने से इंकार कर दिया और अपनी कोर्ट में काम जारी रखने का फैसला किया , ये बात जैसे ही बाबू कौशल प्रसाद को पता लगी उन्होंने जज साहब से मिल उन्हें उनकी कोर्ट के बहिष्कार का फैसला सुना दिया ,जिसे सुन जज साहब सकते में आ गए .*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

मंगलवार, 27 मई 2025

4501.... युद्ध में सिर्फ़ वे ही नहीं मरते मरती है भाषा की देह

मेरे समस्त स्नेही पाठक वृंद
 और ब्लॉगर साथियों का
 सादर और सप्रेम अभिवादन।
अचानक पाँच लिंकों से प्रस्तुति का सस्नेह आमंत्रण मिला, सो हाजिर हूँ।
कल ही युद्ध पर  ' प्रदीप त्रिपाठी'  जी की एक कविता पढ़ी।


युद्ध महज़ युद्ध नहीं होते
युद्ध में सूख जाती हैं
नदियों की आत्मा
पहाड़ों का जिस्म
रत्ती भर
सपनों का समुद्र भी।
युद्ध में सिर्फ़ वे ही नहीं मरते
मरती है भाषा की देह
और इस तरह
मर जाती है
पूरी की पूरी सभ्यता।
**  **  **  **

युद्ध पर बहुत कुछ लिखा गया।  इसके विरोध में कवियों ने आर्त रचनाएँ लिखी। मानवाधिकार कार्य कर्ताओं ने आंदोलन किये। हिंसा के विरोध में अहिंसक धर्म- संप्रदाय बने। पर सबके समानांतर  कभी धर्म कभी सत्ता के नाम पर युद्ध  सदैव चलता रहा। यदि युद्ध  तनिक थमा तो अराजक  तत्व सक्रिय हो  शांत लोगों की नाक में दम करने लगे। अंततः निचोड़ यही कि शांति के लिए युद्ध  जरूरी है। इसके परिणामों की भयावहता से कौन वाक़िफ़ नही। बहरहाल आज का समय भी युद्ध का समय है। उसे भूल प्रेम  और सौहार्द की बात करें। क्योंकि प्रेम रत  व्यक्ति कभी युद्ध का पथ नही अपनाता।
******

आज की विशेष रचना
प्रथम रचना  ब्लॉग चिड़िया से 
जिसमें अंतिम विदा में कातर हृदय का हृदय विदारक प्रश्न है

डाल से, टूटकर गिरता हुआ

फूल कातर हो उठा।
क्यूँ भला, साथ इतना ही मिला ?
कह रहा बगिया को अपनी अलविदा,
पूछता है शाख से वह अनमना -
"क्या कभी हम फिर मिलेंगे ?"

*****
दूसरी रचना ब्लॉग' मन के पाखी 'से। 
जिसमें प्रकृति से एक विकल कवि हृदय की क्षमा याचना है


इन दिनों सोचने लगी हूँ
एक दिन मेरे कर्मों का हिसाब करती
प्रकृति ने पूछा कि-महामारी के भयावह समय में
तुम्हें बचाये रखा मैंने
तुमने हृदयविदारक, करूण पुकारों,साँसों के लिए
तड़प-तड़पकर मरते
बेबसों जरूरतमंदों की क्या सहायता की?


****
तीसरी रचना ब्लॉग' 'पुरवाई' से
कभी कोई सुखती, सुबकती नदी के मन को भी तो पढ़े।
आखिर वो कौन है जो उसके भीतर उतरकर
उसे पढ़ पाता है सिवाय एक कवि के

नदी

अंदर से जानी नहीं गई
केवल
सतही तौर पर देखी गई।
उसकी भीतरी हलचल
का कोई साझीदार नहीं है


प्रेम के पर्याय हैं श्री कृष्ण ।
श्री कृष्ण के प्रेम की भव्यता को दर्शाता
सखी कामिनी का एक भावपूर्ण लेख उनके
ब्लॉग "मेरी नज़र से' से

प्रेम और करुणा के पर्याय है " कृष्णा " 

जिन्होंने बताया "जिसके हृदय में प्रेम के साथ करुणा का भी वास है
सही अर्थ में वही सच्चा धर्माचार्य है,
वही सच्चा भक्त है, वही सच्चा प्रेमी है।


अंत में   प्रेम की सर्वोच्चता को इंगित करती एक हृदयस्पर्शी  रचना
'अमृता तन्मय' जी के ब्लॉग से



लागे है मुझ को बड़ा आन सखी !
उसको मत कहना तू पाषाण सखी !   
इस मंदिर का है वही भगवान सखी ! 
उससे ही तो है मेरा ये प्राण सखी !

शेष फिर...
-रेणु बाला 

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