शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
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धर्म को पुष्ट करने हेतु
आस्था की अधिकता से
सुदृढ हो जाती है कट्टरता ....
संक्रमित विचारों की बौछारों से
से सूख जाता है दर्शन
संकुचित मन की परतों से
टकराकर निष्क्रिय हो जाते है
तर्कों के तीर
जीवन की स्वाभाविक गतिशीलता
को लीलती है जब कट्टरता
तब...
कोई भी गणितीय सूत्र या मंत्र
नहीं जोड़ पाती है
मानवता की साँस
नैतिकताओं को वध होते देखते
प्रत्यक्षदर्शी हम
घोंघा बने स्वयं के खोल में सिमटे
मौन रहकर
जाने-अनजाने, न चाहते हुए भी
निर्लज्ज धर्मांधों के अनुचर बने
मनुष्यता को चुन-चुनकर
मारती भीड़ का हिस्सा बनकर
स्वयं को निर्दोष बताते हैं...।
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आज की रचनाएँ-
जहाँ भावनाएं न हों, समर्पण न हो, त्याग न हो वहाँ रिश्तों के स्थाईत्व के बारे में सोचना उसी तरह बेमानी है जैसे किसी निर्मूल पौधे को पानी में डुबो कर रखने के बाद उसमें किसी कोंपल के फूट आने की आशा रखना ! जिस वस्तु को प्राप्त करने में कठिन तपस्या करनी पड़ी हो उसकी कीमत अनमोल हो जाती है और वह वस्तु प्राणों से भी प्यारी हो जाती है लेकिन जो चीज़ सहज ही मिल जाए उसका कोई मोल नहीं होता न ही उसका महत्त्व कोई आँक पाता है !
प्रकृति का तो नियम स्वंतंत्र है
जकड़े हैं सामाजिक मानदंड से
आडम्बर और खोकली दुनिया में
तभी तो हम इंसान कहलाये हैं !
जकड़े हैं सामाजिक मानदंड से
आडम्बर और खोकली दुनिया में
तभी तो हम इंसान कहलाये हैं !
अजय नें बड़े प्यार से उसे गोद में उठा लिया और समझाने की कोशिश करने लगा कि अगले महीने उसे वह बहुत बढ़िया गाड़ी खरीद देगा, लेकिन बाल हठ कहाँ कुछ सुनता है l वह उस कार को लेने के लिए और भी मचल उठी और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी l वह मीनू और अजय की बात ही नहीं सुन रही थी बस रोये जा रही थीl
वापस आना लौट कर कभी
पास हमारे चंद लम्हों के लिए ही सही।
जब कभी फ़ुरसत भी हो और मौक़ा भी ..
पर तब .. हमारी फुरक़त को कम करने नहीं ;
वरन् .. तथाकथित अकाल मृत्यु से मृत हमारे
उस प्यार की आत्मा की
तथाकथित शांति के लिए केवल आना ।
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आप सभी का आभार
आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में ।
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केल


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