सादर अभिवादन
आज हिन्दी दिवस है
मनाया बिलकुल वैसे ही जाएगा
आज हिन्दी दिवस है
मनाया बिलकुल वैसे ही जाएगा
जैसे गाँधी जयन्ती मनाई जाती है
कोई क्या और कैसे करे
इसकी चिन्ता उन पर ही छोड़ दीजिए
पर हम तो हम ही हैं
हिन्दी को छोड़ें तो छोड़ें कैसे
हमको तो जकड़े गए हैं
हिन्दी की गिरफ्त में...
हमको तो जकड़े गए हैं
हिन्दी की गिरफ्त में...
ओह..
फिर से लिखने लगी मैं...
चलिए आज की चयनित रचनाओं की ओर..
क्या शब्द था - दिव्य !!!
जैसे प्रसन्न आकाश , मुक्त,भव्य ,असीम .
कितना सार्थक दीप्त त्रुटिहीन .
अर्थ का अनर्थ ,
घोर अपकर्ष
कैसी मनमानी वंचना शब्दों से ,
कर डाला
उलझनों की अति हो गई
बोझ मन का कैसे हल्का हो
कहने को शब्द नहीं मिलते
मुंह तक आते आते ही
बेआवाज होते जाते हैं
तुम ग्रामीण अनपढ़ असभ्य हो
प्रज्ञा शील अनुशासन का भान नहीं है
तेरी दो रुपये की मूली पंद्रह में बेचते हैं
हम नसीब वाले तुम पर प्रभु का ध्यान नहीं है
क्या तुम नही जानते कि,
प्यार में कोई शर्त नही होती....
पर तुमने हर मोड़ पर शर्त रखी,
कि जैसे ये रिश्ता सिर्फ मेरा हो..
इसको खिलोना समझ—
खरीदा भी नहीं था—
छीना भी नहीं था,किसी और से
यह एक बहाना भी नहीं था—
खुद से-किसी और से भी नहीं
मेरे वज़ूद से कतरा-कतरा होते रहे
सपने यहाँ कभी बुन
सुन आज प्यार की धुन
मनमीत पास तेरा
मत छोड़ साथ मेरा
हो सके , ऐतबार कर लेना।
और तुम मुझसे प्यार कर लेना।
पहले वादा करो मुहब्बत का ,
फिर गिले तुम हज़ार कर लेना।
आज का शीर्षक....
चोरों की रपट
और गवाही पर
अंदर भी कर
दिया जायेगा
सोच कर लिखेगा
समझ कर लिखेगा
वाह वाह भी होगी
कभी चोरों का
सरदार इनामी
टोपी भी पहनायेगा ।
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आज बस करते-करते आठ रचनाएँ चुन डाली
पता नहीं लोगों के पास समय होगा कि नहीं पढ़ने का
पता नहीं लोगों के पास समय होगा कि नहीं पढ़ने का
आज्ञा दें,,
सादर
सादर






