शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कविता रावत जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में आज की पसंदीदा रचनाएँ-
पोषण पर दुर्भिक्ष घिरा है
खंखर काया खुडखुड़ ड़ोले
बंद होती एकतारा श्वांसे
भूखी दितिजा मुंँह है खोले
निर्धन से आँसू चीत्कारे
फिर देखा हर्ष अकाल पड़ा।।
कविता:स्त्रीपाठ-1:एक स्त्री में देवीत्व- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
कभी देखो एक स्त्री को
मंगलदीप में प्रदीप्त
बाती की तरह
तब दिखेगा रूप
एक स्त्री में
देवीत्व का।
पंक्ति बद्ध सब ओर सजे हैं।।
अपने अपारम्परिक अंदाज़ के लिए मशहूर थे उर्दू शायर जौन
एलिया, पढ़िए उनकी कुछ नज्में
सर्वहित संकल्प दीपोत्सव मनायें, ऐसा मिलकर कोई दीप जलायें!
न हो कोई अपने
घर में बेघर
बड़े-बुजुर्गों
से न रहे कोई बेखबर
रखे ख्याल कोई दिल न दु:खायें
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव