सादर अभिवादन..
अच्छी हूँ आज..
..........
कर्म फल के समय संसार में रोने वाले बहुत मिल जायेंगे
परन्तु..........
कर्म बंधन के समय सावधान रहने वाले विरले ही मिलेंगे।
~ अज्ञात
चलिए चलते है आज की रचनाओं की ओर...
अच्छी हूँ आज..
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कर्म फल के समय संसार में रोने वाले बहुत मिल जायेंगे
परन्तु..........
कर्म बंधन के समय सावधान रहने वाले विरले ही मिलेंगे।
~ अज्ञात
चलिए चलते है आज की रचनाओं की ओर...
सारे रिश्ते
स्वार्थी मतलबी
झूठे होते हैं
चाहे जन्म से मिले
चाहे जग में बने
कोई सोचता है
मैं शब्दों की धनी हूँ
मैं सोचती हूँ
- मैं समय की ऋणी हूँ
अब कौन जाने !!! - पर होता हर बार यही है
कविता का दिक् काल...डॉ. किरण मिश्रा
युवा कविताएं उतार रही है कपडे
उन हिस्सों के भी
जिन्हें ढकने की कोशिश
में त्रावणकोर की महिलाओं ने
कटा दिये थे अपने स्तन
वो सुना रही है कहानी
उन पांच दिनों की
ये शायद टोटका है उनका
आज का शीर्षक...
ड्योढ़ी कब लांघे ?...... विभा दीदी
पति या पत्नी का बहकना
उसके पीछे होता
उसे मिले
संस्कार का होना
सहना तभी तक गहना
जब तक मान न गंवाना
हर भाई बहना समझना
आज्ञा माँगती है यशोदा
आज आदरणीय विभा दीदी की
दो रचनाएँ हैं...समयानुकूल हैं
और एक छिपी हुई रचना भी है
सादर



