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गुरुवार, 26 जनवरी 2023

3650...इस गणतंत्र उठ रहे कुछ सवाल...

शीर्षक पंक्ति:आदरणीय बृजेन्द्र नाथ जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

चित्र:गूगल से साभार 

74 वें गणतंत्र दिवस एवं बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।

 15 अगस्त 1947 को हमारा देश ब्रिटिश सत्ता की ग़ुलामी से आज़ाद हुआ और 26 जनवरी 1950 से हमारा अपना संविधान लागू हुआ अर्थात स्वतंत्र से गणतंत्र बनने में कुछ वर्षों का समय लगा। हमारे देश का संविधान लिखित है जिसमें समय-समय पर देश की परिस्थितियों के अनुसार संशोधन होते रहते हैं। गणतंत्र दिवस पर देश की शक्ति, शौर्य और सांस्कृतिक गतिविधियों की झलक 'कर्तव्य-पथ' (एक साल पहले तक 'राजपथ) पर पेश की जाती है।

ऋतुराज बसंत का आगमन हो चुका है। वाग्देवी सरस्वती माँ का जन्मोत्सव बसंत पंचमी के दिन धूमधाम से मनाया जाता है। नई फ़सल और रंग-बिरंगे फूल व विभिन्न प्रकार की पत्तियों की चमकदार हरीतिमा मन मोह लेती है।  

आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

इस गणतंत्र उठ रहे कुछ सवाल (कविता)


आफ़ताबों की हिम्मत ऐसी बढ़ेगी कि

दिग्भ्रमित श्रद्धा के टुकड़े किए जायेंगे?
न्याय प्रक्रिया इतनी पंगु हो जाएगी
जुल्म साबित करने में वर्षों लग जायेंगे?
विलंबित न्याय का कब सुधरेगा चाल?
इस गणतंत्र उठ रहे कुछ सवाल.

अब लौट कर कभी तो दिगम्बर वतन में आ...

भेजा है माहताब ने इक अब्र सुरमई
लहरा के आसमानी दुपट्टा गगन में आ
 
तुझ सा मुझे क़ुबूल हैज़्यादा न कम कहीं
आना है ज़िन्दगी में तो अपनी टशन में आ

एक देशगान -आज़ादी के दिन वसंत है

वतनपरस्ती जन-जन में हो

देशभक्त हो माली,

सरहद पर अपनी सेना की

गाथा गौरवशाली,

फर्ज़ निभाते बारिश, आंधी

ओले, ग्रीष्म तपन में.

हाईकू (वसंत )

बसंत छाया

धरती पर सरसों

पीली फूली है

झूमकर मधुमास आया

झील के उस पार दिखता,

नीड़ जो आधा झुका।

डालियों पे बैठ उसके,

गीत जो मैंने लिखा॥

आज उन गीतों को गाने का,

बड़ा सुंदर समय।

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 

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