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गुरुवार, 5 जनवरी 2023

3629...तितलियाँ नहीं दीमक कहिए...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया विभा रानी श्रीवास्तव जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

2023 के प्रथम गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ। आइए पढ़ते हैं सद्यरचित पांच चुनिंदा रचनाएँ-

राह कंटकों से भरी

वे कोशिश में सफल हुए

मैंने असफलता का मुंह देखा

जब भी अन्देखा किया उन का

मुझे ही कष्ट भोगना पड़ा  |

अरे चीथड़ों कब जागोगे -सतीश सक्सेना

तुमको धांसू न्यूज़ सुनाकर

प्रेस मीडिया नोट कमाये !'

तुमको भरमाने की खातिर

चोर को साहूकार बताये !

 कविता | नहीं मालूम था | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मुझे नहीं मालूम था

कि धूप

मेरे हाथ से

फिसल कर

शीत में

बदल जाएगी,

लगाम

विवाह के बाद तो घर, परिवार, शहर, गली, मोहल्ला सब बदल जाते हैं ! शादी के बाद कुछ छूट भी मिल जाती है ! हमारी गिनती भी बड़ों में होने लगी ! सोचा अब तो नियंत्रण की यह तलवार सर से हट ही जायेगी ! 

चलते-चलते पढ़िए एक  मर्मस्पर्शी लघुकथा जो रिश्ते की तल्ख़ी बयान कर रही है - 

खाई से जुड़ा दो पहाड़

"तितलियाँ नहीं दीमक कहिए, जिन्हें गुनना नहीं बस... सहायिका को जमीन खरीदकर उसपर घर बनवाकर देने के बाद वो कहती है कि क्या ईंट निकालकर खायें!"

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


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