शीर्षक पंक्ति: आदरणीया विभा रानी श्रीवास्तव जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
2023 के प्रथम गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ। आइए पढ़ते हैं
सद्यरचित पांच चुनिंदा रचनाएँ-

वे कोशिश में सफल हुए
मैंने असफलता का मुंह देखा
जब भी अन्देखा किया उन का
मुझे ही कष्ट भोगना पड़ा |
अरे चीथड़ों कब जागोगे -सतीश सक्सेना

तुमको धांसू न्यूज़ सुनाकर
प्रेस मीडिया नोट कमाये !'
तुमको भरमाने की खातिर
चोर को साहूकार बताये !


चलते-चलते पढ़िए एक मर्मस्पर्शी लघुकथा जो रिश्ते की तल्ख़ी बयान कर रही है -

"तितलियाँ नहीं दीमक कहिए, जिन्हें गुनना नहीं बस...
सहायिका को जमीन खरीदकर उसपर घर बनवाकर देने के बाद वो कहती है कि क्या ईंट
निकालकर खायें!"
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव