नमस्कार ! आज , जब मैं प्रस्तुति बना रही हूँ तो सब क्रिसमस मना रहे हैं ...... भारतीयों की दृष्टि से देखें तो आज हमारे दो महान नायकों का जन्मदिन भी रहा है ........ महामना मदन मोहन मालवीय जी और अटल बिहारी वाजपेयी जी का . ..... यानि कि आज का दिन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है ........ क्रिसमस का त्यौहार अनेक देशों में अलग अलग तरीके से मनाया जाता है ...... इस पर विस्तृत जानकारी लेते हैं इस पोस्ट से .....
सयुंक्त राष्ट्रीय की यूनीवर्सल पोस्ट यूनियन के अनुसार "सांता क्लाज़ को ढेरों नन्हें मुन्ने बच्चों की पाती मिलती हैं "सांता कितने लोकप्रिय हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगया जा सकता है कि कम से कम २० देशों के डाक विभाग सांता के नाम से आने वाली चिट्ठियों को अलग करने और फ़िर उनका जवाब देने के लिए अलग से कर्मचारी भरती करते हैं ...
लीजिये , बच्चों के मनोविज्ञान को देख विशेष रूप से पत्र पढ़ने के लिए कर्मचारियों की न्युक्ति की जाती है लेकिन बूढ़े होते माँ बाप का मनोविज्ञान कौन समझ पायेगा ? एक ऐसी ही मर्मस्पर्शी रचना .....
और फिर रात गुजर गई
क्यों जी, सो गये क्या?'
'नहीं'
'अभी अमरीका में क्या बजा होगा?'
'अभी घड़ी कितना बजा रही है?'
'यहाँ तो १ बजा है रात का.'
'हाँ, तो वहाँ दोपहर का १ बजा होगा. समय १२ घंटे पीछे कर लिया करो.'
'अच्छा, संजू दफ्तर में होगा अभी तो'
न जाने कितनों का सच होगा ये .....और कितने ही लोगों की रातें यूँ ही गुज़रती होंगी ..... चलिए ये तो परिवार की बात है ...... बच्चे इस गलाकाट प्रतियोगिताओं में मशीन बन कर रह गए हैं ..... संवेदनाएँ मृत हो चुकी हैं लेकिन उन मृत संवेदनाओं का क्या जो अपने ही स्वार्थ में संबंधों को ही बदनाम कर दें ....... जब प्रगाढ़ सम्बन्ध दरकने लगें तो क्या उचित और क्या अनुचित है , इस पर रोशनी डाल रही है ये पोस्ट .....
कुछ इस तरह
मतलब साफ है कि वो रिश्ता सिर्फ़ उनके अहंकार को पुष्ट करने का मात्र जरिया भर था बाकी अन्दर भूसा ही भरा था। सारे कोमल रेशमी धागे बुरी तरह उलझ जाते हैं ।वे जरा नहीं सोचते कि अपने पुराने संबंधों की कुछ तो मर्यादा रखें। मैं- मैं का गान खुद करेंगे औरों से भी करवाएंगे।
पता नहीं लोग संबंधों को कैसे अनदेखा कर देते हैं और ज़रा सी दूरी आने पर बदले की भावना घर कर जाती है ....... जबकि होता यह है कि भले ही कुछ पीछे छूट गया हो , जीवन नित आगे ही बढ़ता है ...... लेकिन यादें धरोहर होती हैं ....... इसी विषय पर एक प्यारी सी पोस्ट ....
स्मृतियाँ साथ चलती हैं
स्मृतियाँ चाहे अनचाहे मन की चौखट पर दस्तक दे ही देती हैं । अधिकार जताती हैं और हमारे समय और ऊर्जा को लेकर स्वयं को पोषित करती हैं । इन्हें तो हमारा दखल भी बर्दाश्त नहीं । जितना उपेक्षित करो उतनी ही दृढ़ता मन के द्वार खटखटाती हैं । यादों के आगे मन की विवशता भी देखते ही बनती है .
कुछ यादें साथ चलती हैं तो कुछ न जाने कहाँ गिर कर विलीन हो जाती हैं ........ आइये पढ़ते हैं कुछ यादों को लिए ये ग़ज़ल ....
उफ़ुक़ से रात की बूँदें गिरी हैं ...
इसे मत दर्द के आँसू समझना,
टपकती आँख से यादें गिरी हैं.
मिले तिनका तो फिर उठने लगेंगी,
हथेली से जो उम्मीदें गिरी हैं.
औरत की कहानी
इसका अंदाज़ा मुझे नहीं, तुझे होना चाहिए।“ प्रभा को रोशनदान की ओर से आव़ाज आती-सी लगी। उसने देखा वहाँ बैठी पीली चिड़िया ने पंख फड़फड़ाए और आसमान की ओर उड़ गयी थी। प्रभा ने दूसरे हाथ में पकड़ी किताब मच्छर के ऊपर पटक दी। अचानक हुए प्रहार से मच्छर वहीं ढेर हो गया।
कुछ ज्यादा ही गंभीर चिंतन हो गया ...... चलिए इस पर मनन करते हुए प्रकृति का भी आनंद लिया जाए ..... पहाड़ , नदी , झरने , सभी सबके मन को आनंदित करते हैं तो किसी को बादल , रात , चंद्रमा प्रभावित करते हैं ......... आइये इन्ही विषयों पर पढ़ते हैं कुछ रचनाएँ जो अद्भुत सौन्दर्य को वर्णित कर रही हैं .....
अहा इस रात का सौंदर्य वर्णन कौन कर सकता।
कवित की कल्पना में भी न ऐसी रात ढल पाई।।
रजत के ताल बैठा शशि न जाने कब मचल जाए।
भ्रमित से स्नेह बंधन में जकड़ कर रात गहराई।।
चंद्रमा के अनेक नाम से सुसज्जित रचना पढ़ कहीं तो मन में ये पंक्तियाँ गूँज गयीं - चारु चन्द्र की चंचल किरणे ......... खैर अब रात की बारी ........
रात तो वेदना जगा रही लेकिन मेघ जो हैं सब कुछ कुर्बान करने को तत्पर रहते हैं , नीचे लिखी पंक्तियाँ लेखिका ने स्वयं के लिए कही हैं शायद .....
ये बादल....
ये बादल....
कभी इन बादलों को गौर से देखो
कितनी आकृतियां बनाती हैं ये
मानो बादलों में अटखेलियां करती हैं .
ये सब कल्पना की उड़ान में कवि या कवयित्रियाँ न जाने क्या क्या रच देती हैं ........ लेकिन कभी कभी जीवन से रु - ब - रु हो कर भी बहुत कुछ लिखा जाता है ...... आइये इस हलचल की यात्रा समाप्त करने से पहले इस यात्रा में शामिल हों .....
यात्रा
यात्रा के हैं अनगिन रूप
कभी छाँव मिले कभी धूप
प्रथम यात्रा परलोक से
इहलोक की
नौ महीने की विकट यात्रा
बन्द कूप में सिमटी हुई यात्रा
चलिए जी अब ये यात्रा तो सबने ही करनी है ....... सबके पास कन्फर्म टिकट है , लेकिन इस यात्रा की तारीख किसी को नहीं पता ....... बस जी चल पड़ेंगे जब हुकुम आएगा ....... तो तब तक पढ़िए आज की दी हुई सारी पोस्ट और अवगत करिए अपने विचारों से ......
जाते जाते ये साल कुछ खुशियाँ लाया है । वरिष्ठ और प्रवासी ब्लॉगर शिखा वार्ष्णेय के हिंदी के प्रति किये गए कार्यों के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने निर्मल वर्मा राष्ट्रीय पुरस्कार देने की घोषणा की है । हम सभी ब्लॉगर परिवार की तरफ से उनको हार्दिक बधाई -
अब मिलेंगे अगले साल ..... तब तक के लिए .......
नमस्कार
संगीता स्वरुप .
