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शनिवार, 18 फ़रवरी 2023

3673... नलिन विलोचन शर्मा

    हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...

‘नकेन’ शब्द नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार और श्री नरेश के प्रथमाक्षरों को मिलाने से बना है ।

नलिन विलोचन शर्मा

उन्होंने यह भी कहा: “आलोचनात्मक विवेक उनकी इतिहास-दृष्टि की केन्द्रीय विशेषता है.” लेकिन विधेयवाद संबंधी आरोप को छोड़ दें, तो भी नलिन जी जिस भारतीय इतिहास-दृष्टि की बात करते हैं और उसके उदहारण के रूप में हजारी प्रसाद द्विवेदी के इतिहास को रखते हैं, वह क्या विचारणीय नहीं है? जब साहित्येतिहास के क्षेत्र में शुक्ल जी की दृष्टि की ही प्रधानता थी, तब नलिन जी ने साहित्येतिहास के क्षेत्र में भारतीय दृष्टि का प्रश्न उठाया. 

नलिन विलोचन शर्मा

अपनी एक पुस्तक –‘द यूज ऑफ पोएट्री एण्ड द यूज ऑफ क्रिटिसिज़्म’ में इलियट ने लिखा है- मुझे लगता है कि कवि यह मानता है कि उसकी कुछ सामाजिक उपयोगिता है। लेकिन मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि उसे धर्म-विज्ञान, उपदेशक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री या अन्य किसी रूप में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। वह कुछ भी कर सकता हैं, किन्तु जब वह कविता लिखता है तो कविता ही लिखनी चाहिए कविता जो कविता के रूप में मान्य हो, न कि किसी अन्य रूप में।

नलिन विलोचन शर्मा

जब हिंदी में इतिहास-दर्शन की चर्चा से प्रायः लोग अनजान थे, तब उन्होंने ‘साहित्य का इतिहास-दर्शन’ जैसी महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखकर इतिहास-लेखन की आधारभूमि को मजबूती दी थी। वे मानते हैं कि साहित्य का इतिहास वस्तुतः गौण लेखकों का इतिहास है। बड़े-बड़े लेखकों के आधार पर साहित्य का इतिहास लिखनेवाले इतिहास-दृष्टि से भिन्न यह नयी इतिहास-दृष्टि थी। समाज या राष्ट्र का इतिहास राजाओं का इतिहास नहीं बल्कि जनता का इतिहास है, इस कथन से नलिन जी के कथन को मिलाकर देखना चाहिए, तब उनकी इतिहास-दृष्टि की सामाजिकता और व्यापकता दिखाई देगी।

नलिन विलोचन शर्मा

अधिक-से-अधिक तब के गुमनाम से उपन्यास ‘मैला आँचल’ को कालजयी उपन्यास के रूप में पहचान दिलाने वाले आलोचक के रूप में याद किए जाते हैं. हिंदी के इतिहास दर्शन की चर्चा जब न के बराबर थी तब ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’ जैसी किताब लिखने वाले आलोचक के रूप में भी उनका नामोल्लेख होता है. और किसी प्रसंग में उन्हें याद करते या उन्हें उद्धृत करते प्राय:  नहीं देखा-सुना जाता . ऐसा क्यों है; जबकि वे हिंदी के ‘सिगनिफिकेंट’ आलोचक हैं? दुनिया सोवियत और अमेरिकी शिविर  में बंटी हुई थी. राजनीतिक  रूप से दो सिरों में विभाजित विचारधारा का प्रभाव दुनिया के साहित्य पर भी था. माना जाता था कि या तो आप प्रगतिशील हैं या गैर-प्रगतिशील.

नलिन विलोचन शर्मा

 ‘दृष्टिकोण’ (1947),‘साहित्य का इतिहास-दर्शन’ (1960),‘मानदंड’ (1963),‘हिन्दी उपन्यास : विशेषतः प्रेमचंद’ (1968),‘साहित्य: तत्त्व और आलोचना’ (1995) उनकी आलोचनात्मक पुस्तकें हैं ।हिंदी में इतिहास-दर्शन जैसे गंभीर विषय पर लिखने वाले वे पहले व्यक्ति हैं । सभी तरह के नए-पुराने विषयों और विश्व के श्रेष्ठ साहित्य पर उनकी एक समान पकड़ थी । जिस अधिकार से वे कालिदास पर लिखते थे, उसी अधिकार से अपने समकालीन अज्ञेय आदि पर भी । रूसी कथाकार तुर्गनेव,दास्ताव्स्की, फ्रांसीसी उपन्यासकार आन्द्रे जींद, इंग्लैंड के गल्पकार आर्थर कोयस्लर और टी.एस. एलियट जैसे बड़े रचनाकारों पर लिखने वालों में भी संभवतः वे हिन्दी के पहले आलोचक हैं ।

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पुनः भेंट होगी...
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शनिवार, 11 फ़रवरी 2023

3666... प्रेम-विरह

11 फरवरी प्रॉमिस डे
प्रॉमिस डे का मतलब है प्यार को हमेशा जिम्मेदारी और वादों के साथ निभाएं
 हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...

प्रेम-विरह

मन भी कुछ समझ नहीं पाता है। 

जाने क्या पता इसकी क्या मजबूरी है? 

किस बात के लिए खुद की मंजूरी है? 

जो हर राज़ को सभी नजरों से बचाता है, 

प्रेम-विरह

जब जब सुलगती दिल में विरहा की आग,

तब तब करवटें बदलता है अंदर अनुराग ।

राह निहारते हुए अंखियां थक जाती जैसे,

 फिर एक मधुर उम्मीद जगा देती है रैन ।

प्रेम-विरह

जानी पहचानी सूरत भी अब, अंजानी सी लगती है 

भरे हुए तरक़श यादों के,इस दिल पर तीर चलाते हैं

भूल हुई यों दिल का लगाना, वो दिन याद दिलाते हैं 

झर- झर आँसू सूख गए अब अंगारों से नैन हुए हैं।

प्रेम-विरह

नाराजगी को भ्रम बतलाऐगी;

अलपक देखता देख मुझे ;

शर्माऐगी ,मुस्कायेगी ;

हल्की थपकी गालो पे लगा जायेगी|

प्रेम

भारतीय काव्य शास्त्र, भक्ति, दर्शन और चिन्तन यह स्थापित करते हैं कि प्रेम का वास्तविक आनंद प्रिय के व्यक्तित्व में खुद को लीन कर देना है। ‘बारिश-सी लड़की’, ‘शुकराना’ और ‘गल्र्स स्कूल की लड़कियाँ’ कविताओं में स्त्री के उन्हीं मनोभावों को सार्थक एवं मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति दी गई हैं। इसमें भी बिम्ब-विधान ऐसा कि पाठक सहसा कह उठे–वाह! ‘लड़की ने धूप से बचने को एक छतरी मांगी/ लड़का दौड़कर गया और बारिश का मौसम उठा लाया।’ भीगते हुए लड़की का बारिश बन जाना, लड़के का उसी बारिश में फिर भीगना प्रेम के साथ हुआ व्यक्तित्वांतरण है जो प्रेम से हार्दिकता, साहचर्य, संयोजकता, परार्थपरता, अनन्यता, आस्था-विश्वास, दृढ़ता, अक्षुण्णता, निर्भयता, मंगल और आनंद की मांग करता है।


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पुनः भेंट होगी...
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शनिवार, 10 दिसंबर 2022

3603... मानव

       हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...

मानव अधिकार दिवस प्रत्येक वर्ष 10 दिसंबर को दुनिया भर में मनाया जाता है। मानवाधिकारों की पहली वैश्विक घोषणा और नए संयुक्त राष्ट्र की पहली प्रमुख उपलब्धियों में से एक, मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा की 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के अंगीकरण और उद्घोषणा का सम्मान करने के लिए तिथि का चयन किया गया था।

मानव  जीवन जो हमें यह मिला, 

प्रकृति का यह सर्वोत्तम उपहार ।

हम जीवन को चार चाँद लगा दें,

चाहे जितना हम पाल लें विकार ।।

जीवन हमारा जितना सुंदर होगा,

उतना ही सुंदर होगा यह संसार ।

मर रही है मानवता

रिश्ते भी हैं खो रहे

संवेदनाएँ कुँभकर्णी 

नींद के आग़ोश में हैं।

मानव जैसे मानव रहा ही नहीं

कदम दर कदम,

लगातार

अतीत के अनुभवों का ले सहारा,

अपने को सुधारा,

अपने रूप को सँवारा।

हम मानव जो कभी झूलते थे

पेड़ों की शाख से,

कभी रहते थे

कंदराओं, गुफाओं में।

आदि मानव मैं –

आदिम – सदियों से

सदियों तक।

अवसर ही ना मिला

सभ्य होने का ।

चढा मुखौटे सँवारता रहा

बस अपने आपको।

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पुनः भेंट होगी...
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