सादर अभिवादन
सखी श्वेता अस्वस्थ हैं
इसलिए
आज गेंद मेरे पाले में फिर से
नदियां बांधी,
जंगल काटे
धरती खोदी,
पर्वत छांटे
जैसी करनी-
वैसी ही भरनी
हम सबकी है ये
गलती अपना
प्रतिशोध प्रकृति का है
ये वज्राघात
देखी न सुनी,
ऐसी बरसात
चलिए रचनाएं देखें
.......
लिख दिया तक़दीर में,
ख़ुदा ने जो भी हमारे।
नमाज़ में दुआओं के,
हम सब उसके सहारे।
मर्यादाएं झुलस रही हैं,
सीमाएँ सब टूट रहीं हैं।
कब तक मौन रहेगा मुख पर,
घुटती साँसें पूछ रहीं हैं।
दिनभर कई बार
फैलाता हूं अपनी हथेलियों को
बेहतर गुजरे दिन की दुआ
मांगने नहीं
धूल से सने पसीने को
पोंछने के लिए
और उसके लिए
जिसके बिना
अधूरा है
जीवन का चक्र
हर जाति धर्म के मध्य गहन खाई ,
निर्धनता अधिकारों से वंचित हो |
वह देश छुयेगा नील गगन कैसे ,
हर प्रतिभा प्रतिबंधों से बाधित हो |
जो धरा स्वार्थ लिप्सा में सब डूबी ,
उसका प्रभात तुम कोहरे में समझो |
आओ अब अतीत में झाँकें...
आधुनिकता ने ज़मीर
क्षत-विक्षत कर डाला है.
भौतिकता के प्रति
यह कैसी अभेद्य निष्ठा
दर्पण पर धूल
छतों पर मकड़ी के जाले
कृत्रिम फूल-पत्तियों में
जीवन के प्रवाह का अन्वेषण.
......
आज गणपति जी विजय करेंगे,
पूजन हेतु रखी छोटी मूर्तियां सुबह ही हवनोपरान्त
विसर्जित कर दी गई थी अगले साल फिर आना यह वादा लेकर
आज बस
सादर




