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सोमवार, 1 अगस्त 2022

3472 / बिहारी समझ बैठा है क्या ?

 

नमस्कार !  सावन का  महीना ....... इस वर्ष के सात माह समाप्त हो गए ....... कोरोना भी काफी कुछ कंट्रोल में हो चला है .....लोग आराम से एक स्थान से  दूसरे  स्थान पर आ - जा रहे हैं  ,   डर जो समाया हुआ था मन में  काफी कुछ कम हो  गया   है ........  तो ऐसे में  इंतज़ार करते करते   प्रश्न पूछा जा रहा है  कि कब आओगे ....... नेह की फुहार पड़ रही हैं .......

गावत मेघ मल्हार


मोतियन रूप धरे आए हैं

गावत मेघ मल्हार 

कंत तुम कब आओगे 

नेह की परत फुहार 


  चलिए इंतज़ार तो सही है लेकिन बहुत बार ये लगता है  कि  क्या हम इंच भर भी आगे बढ़ पाए हैं ?  या जहाँ खड़े थे वहीँ पर टिके हुए हैं ?  बड़ी जद्दो - ज़हद्द सी चल रही है प्रवीण जी के मन में ....

जहाँ से चले थे, वहीं पर खड़े हैं



वही प्रश्न हैं और उत्तर वही हैं,

नहीं ज्ञात यह भीसही या नहीं हैं,

समस्या भ्रमितहर दिशा अग्रसर है,

नहीं प्रश्न निश्चितसमुत्तर इतर है,

बहे काल कल कलरहे चित्त चंचल,

चले  रहे हैंविचारों के श्रृंखल,

चुने कौन समुचितउहा में पड़े हैं,

जहाँ से चले थेवहीं पर खड़े हैं।


अब जहाँ से चले थे  वहाँ  का तो पता नहीं  लेकिन अधिकतर लड़की की ज़िन्दगी में बहुत से पल ऐसे आते हैं कि उसे आगे बढ़ना ही होता है ....... जो नहीं बढ़तीं वो हमेशा दूसरों के कथन को ही मानाने को बाध्य सी होती रहती हैं ........पढ़िए एक रोचक और प्रेरक संस्मरण ......


लड़की की फोटो


एम.एम.एच. कॉलेज से ड्रॉइंग एन्ड पेन्टिंग में एम.ए. की पढ़ाई कर रही लड़की की शादी की बातें शुरु हो चुकी हैं। तो सबसे पहले तो एक फोटो की दरकार है लड़की की, वो भी स्टूडियो में मेकअप करके बनारसी साड़ी पहन कर और स्टैंड  पर हाथ रख कर पोज बनाते हुए ।सही अनुपात में हंसते हुए। एकदम सही अनुपात से…मतलब न थोड़ा सा भी ज्यादा कि बेशर्म लगे और न ही इतना कम जो घुन्नी लगे। लेकिन अब सवाल ये है कि बिल्ली के गले में घंटी बाँधे कौन ? 

अब बिल्ली के गले में आखिर घंटी  बाँध  ही  ली  जाती है येन केन प्रकारेण ......  और आगे की ज़िन्दगी में न जाने कब और  कैसे  कुछ रूखे से भाव मन में समा जाते  हैं  ....लेकिन उन भावों को पूरी ग़ज़ल लिखने की प्रक्रिया से जोड़ कर कितना सरस बना दिया जाता है ........ पढ़िए आप भी ... 

ईरानी गलीचे पर फैलता इश्क 

गाव तकिये पर अपने आप को सहारा देते 

गिर गिर पड़ते शेर 

अपनी सरहदों को छोड़ हारमोनियम पर 

सर टिकाये 

काफ़िया - रदीफ़ |


जहाँ तक रुसवाई की बात करें तो  न जाने क्यों आज भी लड़कियाँ अपने सपनों को जी नहीं पातीं ........... कुछ परिवार का डर तो कुछ समाज का ...... इस बात को महसूस कर पायेंगे एक लघु कथा में ... 

 विसर्जन 

”न जाने कितनी छोरियों के स्वप्न डूबे हैं इसमें! पानी नहीं होता तो भी इसी में पटककर जाती।”

आँखें झुका पैरों में पहने चाँदी के मोटे कड़ों को हाथ से धीरे-धीरे घुमाती साठ से सोलह के पड़ाव में पहुँची बुआ उस समय की चुप्पी में शब्द न भरने की पीड़ा को आज संस्कार नहीं कहे।

"जल्दी ही जीना भूल जाती हैं औरतें कब याद रहता है उन्हें कुछ ?”


अब जीना न भूलें , इसके लिए ज़रूरी है कि ज़िन्दगी से कुछ  बतिया लिया जाए ........ जैसी भी है ..... अच्छी - बुरी ,  आड़ी - तिरछी .......

गुफ्तगू....ज़िंदगी से


हांकती गयी तुम,
और मैं भी दौड़ी बदहवास,
सोचा कम और भागी ज़्यादा,
कभी  ठिठकी, तो ठेल दिया,
कभी मुड़ी, तो धकेल दिया,
कभी दोराहों पर भटकाया,
कभी पतली गली में पटकाया,

 सच है कि ज़िन्दगी न जाने कब  कहाँ  पटक दे ..... इंसान सोचता कुछ है और उसके साथ होता कुछ और है ......ख़ास तौर से यदि आप अपने हक के लिए लडाई करें तो सही होते हुए भी आपको मुँह की खानी  पड़ सकती है ...... ऐसा ही एक नज़ारा  यहाँ भी है .....


रफ़ीक मियाँ कोर्ट के बाहर बुरी तरह से चीख रहे थे और अपने कपड़े नोच रहे थे.भीड़ आस पास तमाशा देखरही थी. कोइ बोला,”सत्तर बरस का बूढ़ा रोड पर नंगा होकर क्या कर लेगा...... फिर भी चिल्लाने दीजिये शायद हमारे देश की न्याय व्यवस्था को शर्म आ जाए!

अब न्याय व्यवस्था ही क्यों कोई भी व्यवस्था  आम आदमी को चैन कहाँ लेने देती है ..............यदि सच ही चैन से रहना है तो चैन के लिए आपको स्वयं ही प्रयत्न  करने  पड़ेंगे ..... और ये भी ज़रूरी नहीं कि आप कामयाब हो ही जाएँ ....... फिर भी पढ़ लीजिये शायद आपको कामयाबी मिल जाये ....

ऐसे ही एक दिन जब मैंने 'चैन नाम की चिड़िया'  को फिर से अपने जीवन के आँगन में चहचहाते हुए महसूस किया तो ख्याल आया कि आजकल ये कम ही आती है! कभी-कभी तो बहुत दिनों तक दिखाई ही नहीं देती!  कहाँ उड़ जाती है ? क्या इसे किसी नेता की नज़र तो नहीं लग गयी? या फिर मुझसे ही तंग आकर यह कहीं फुर्र हो जाती है? और फिर अचानक से प्रकट हो जाती है|

मुझको तो लगता है कि सच्चा चैन पाना है तो जो हम कर सकते हों वो हर संभव  दूसरों   की मदद करनी चाहिए ....  भले ही वो बहुत छोटी सी हो .... लेकिन वो करके जो ख़ुशी मिलती है ,वो वर्णित नहीं की जा सकती ........ ऐसा ही एक संस्मरण ....


आज एक बार फिर कारगिल से जुड़ी ये घटना याद आ गयी ……लड़ाई एकदम घमासान चल रही थी . शाम में दिल्ली के  विलिंगटन हॉस्पिटल से  एक डॉक्टर साहब का फोन आया ,मेरे पति से बात करना चाह रहे थे . मेरे यह कहने पर कि इस समय वो घर पर नहीं हैं बेहद परेशान लगे .......

देश के जवानों के लिए किया गया छोटा सा  कार्य  भी मन को बहुत प्रसन्नता से भर देता है ....ऐसे ही देश के जाने माने साहित्यकार के प्रति भी मन में आदर के भाव उमड़ते हैं ..... आज जब ये हलचल लगा रही हूँ  तो प्रेमचंद  जी की जयंती है .......और ये मेरे पसंदीदा लेखक हैं ....कौन भूल पायेगा ईदगाह को , या फिर बूढी काकी को ......कफ़न जैसी कहानियाँ अमर होती हैं .... इनका मूल नाम धनपत राय था ..... आप इनके बारे में पढ़िए ये रचना ....


ताप उदर का जब लहके,

मन की पीड़ा सह-सह के।

ज्वार विचार का उठता है,

शब्द-शब्द वह गहता है।

 प्रेमचंद जी  के लेखन को रेखांकित करती ये रचना मन में  बस  गयी है ........ ...... यूँ तो मन में न जाने क्या क्या बसा रहता है ...... सावन से ये हलचल शुरू की और आखिर तक आते आते फिर सावन की फुहारों ने ही  श्रृंगार किया हुआ है ..... कुछ दोहे देखिये ....

धरती का श्रृंगार


झूमर, कजरी लिख दिया,  कुछ सावन के गीत। 
गाऊँ जिसके साथ मैं,  मिला नहीं  वो मीत।। 

अब मीत मिले या न मिले ........ आपको ले चल रही हूँ उस काल में जब ब्लॉग के दुश्मन  फेसबुक  ने पदार्पण ही किया था ..... नया - नवेला  था .... लोगों ने हाथों हाथ लिया ...... और ब्लॉग का रास्ता भूल गए ..... खैर .........इस फेसबुक  के माध्यम से क्या बात निकल कर आई , इसका जायजा लें .....


हमारे पुराने  ब्लॉगर  ताला बहुत लगा कर रखते हैं .............खुद तो देख भाल करते नहीं  , शायद इसी लिए सुरक्षा का ज्यादा ध्यान रहता है ..... बस समझ लीजिये की हर फेस  बुक की तरह होता है ........ खैर ...... बुक की तरह होता है या नहीं लेकिन कभी कभी  कोई शब्द    अर्थ  के रूप में  आरूढ़  सा हो जाता है ........ मन के दर्द को व्यंग्यात्मक शैली में लिखने का प्रयास मात्र है ............


आजकल मैं सभ्य दिखने लगा हूँ। असभ्य तो मैं पहले भी नहीं थापर दिखता नहीं था। अब दिखता हूँ इसका अहसास मुझे अपनी पिछली दिल्ली यात्रा पर हुआ। दिल्ली विमान पत्तन से पूर्व भुगतान टैक्सी में सवार हो जब साउथ ब्लाक के लिए चला तो एक लाल सिग्नल पर टैक्सी को कुछ देर के लिए ठहरना पड़ा। एक सामान बेचने वाला टैक्सी के पास आया तो टैक्सी ड्राइवर ने बेची जा रही वस्तु का दाम पूछा। विक्रेता ने डेढ़ सौ कहा। इस पर टैक्सी चालक का जुमला था – “चल बे,..जा। बिहारी समझ बैठा है क्या

और इस  फुर्सत के बाद  और कुछ नहीं ............ वैसे भी  पठास मिटाने  के लिए इतनी डोज़ ज़रूरी है ......... ये हलचल की डॉक्टर संगीता स्वरुप  का कहना है ...😆😆😆 
पूरी डोज़ लीजियेगा ........बाकी अगले सप्ताह .........
 स्वस्थ रहें ........ मस्त रहें ........ दिए हुए लिंक्स  पढ़  लें ......

आपकी ही 
संगीता स्वरुप ..

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