शीर्षक पंक्ति:आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक पाँच ताज़ातरीन रचनाओं के लिंक्स के साथ हाज़िर हूँ-
लगने लगता सारा जग एक
फरेवों की दुकान सा
अब सुविचारों पर से भी
दूर हटा मन मेरा।
किसी दिन वह कहता कि वह अत्यधिक प्रेम से ऊब
जाता है..
किसी दिन किस्सा सुनाता कि कैसे उसे अपनी
करीबी मित्र से प्यार हो गया था लेकिन बस इकतरफा वह महिला तो अपने पति के प्रति
वफादार थी।
पवन झकोरों के संग देखो
टूटे शाख से पल्लव
दर्द उठा तरुवर के मन में
उठती नज़र हुई नम
ऐसा लगने लगा है,मैं हूँ इक नदिया विकल सी ,
तुम सागर सरीखे,मैं तुमसे मिलने को अधीर सी,
अतृप सी दौड़ती,मचलती,छलकती हुई आती हूँ ,
तुम्हारे एहसास संग अपना सार सम्पूर्ण पाती हूँ।
*****
फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव