सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।
महान संत कबीर साहब का ग़ज़ल शैली का अंदाज़ पढ़िए-
"हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को होशियारी क्या?
रहें आज़ाद या जग से,हमन दुनिया से यारी क्या?"
-कबीर
अब पढ़िए आज की पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
कोकिला कूजित मधुर स्वर
मधुकरी मकरंद मोले
प्रीत पुलकित है पपीहा
शंखपुष्पी शीश डोले
शीत के शीतल करों में
सूर्य के स्वर्णिम उजेरे।।
युद्ध नहीं चाहती मां
युद्ध नहीं चाहता पिता
युद्ध नहीं चाहते नाना-नानी
युद्ध नहीं चाहते दादा-दादी
युद्ध नहीं चाहते बच्चे
फिर कौन चाहता है युद्ध?
वे जिन्हें नहीं होना पड़ता अनाथ
न बनना पड़ता है शरणार्थी
और न नहाना पड़ता है रक्त से
समाज
को आईना दिखाती हुई नई कविता-फटा जूता
फटे जूते के छेद से
समाज करता है
आकलन,
किसी की प्रतिष्ठा,
किसी के रुतबे का,
और उस मोची ने
सिल दिया उस
फटे जूते को,
और बचा ली
किसी की
इज़्ज़त।
नई किताब-वह चिड़िया क्या गाती होगी
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आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगले गुरुवार।
रवीन्द्र सिंह यादव