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सोमवार, 3 जनवरी 2022

3262 /2022 ..... नव वर्ष की पहली पाक्षिक हलचल

 नमस्कार !  नव वर्ष की पहली पाक्षिक हलचल ले कर हाज़िर हूँ , आपकी अपनी " संगीता स्वरूप " । यूँ तो अभी  नए वर्ष की शुभकामनाएँ देने लेने का खुमार उतरा नहीं है ,तो आप सब इस खुमार के साथ मेरी भी नए वर्ष की शुभकामनाएँ स्वीकार करें । ये साल सबके लिए ही अच्छा हो ।

   आज नूतन वर्ष और गत वर्ष की देहरी पर खड़े हो कर जब पलट कर देखती हूँ तो यादों की जैसे पिटारी खुल जाती है । पिछले वर्ष हमने अपने कुछ ब्लॉगर के रूप में नायाब मोतियों को खो दिया । उनको याद करते हुए आज की हलचल बिछड़े हुए साथियों के नाम कर रही हूँ । 
सबके ब्लॉग तक नहीं पहुँच पाई लेकिन जाने वाले जिन ब्लॉगर्स के ब्लॉग तक पहुँच पाई उनकी रचनाएँ आपकी नज़र  हैं ......

गिरिजेश राव जी .... एक जाने माने ब्लॉगर रहे हैं ......ये कई   ब्लॉग्स   चला रहे थे .....लेकिन " एक आलसी का चिट्ठा " सबसे ज्यादा प्रचलित था .....आप इनके प्रोफाइल पर इस लिंक से पहुँच सकते हैं





मुख्य रूप से इनके दो ब्लॉग्स की प्रथम और अंतिम पोस्ट आपके सम्मुख रख रही हूँ .....




दूसरा  ब्लॉग  है .... कवितायेँ और कवि भी 


प्रार्थना .... ब्लॉग  पर  मेरी पहली कविता ..... छोटी सी कविता के माध्यम से सुन्दर भावों  से सजी  खूबसूरत प्रार्थना है .

१३ फरवरी २०२१ को इनकी अंतिम पोस्ट आई है .... कोई दीप .

इनके ब्लॉग से कोई भी सामग्री कॉपी नहीं की जा सकती है ......इसलिए मैंने  केवल पोस्ट के  लिंक लगाये हैं ..... जो भी इनको पढना चाहें इनके दिए हुए प्रोफाइल के लिंक से सभी ब्लॉग तक पहुँच सकते हैं ..... 


अब आपको मिलवाते हैं एक वरिष्ठ  ब्लॉगर  से जो  ' अकेला " तखल्लुस लगाते थे ..... अशोक सलूजा जी  . 
इनका एक ही ब्लॉग है  .... यादें ...

इन्होने अपने ब्लॉग में अपने जीवन की स्मृतियों को ही पिरोया है ....
यादों का सफ़र से उन्होंने ब्लॉग पर दस्तक दी थी ....




मुझ को पाला था,पोसा था, बडा प्यार
दिया था मेरी नानी ने,
मुझ को अपने कन्धों पे घुमाया था,
मेरे मामा ने अपनी जवानी में॥
न माँ,न मौसी , न भाई, न बहना, न नाना
थी मेरी नानी,तो बस था एक ही मामा सयाना ॥


खुद तो झूल लिए थे 2012 में ...... और आज इस पोस्ट को देख हम उनको याद कर रहे हैं .... 

यादों... के बवंडर,
दुखों की आंधियां...
एक सदियों पीछे ले जाता है 
और एक मीलों आगे....

वैसे तो आगे बड़ने को ही जिन्दगी मानते हैं 
पर कभी-कभी पीछे मुड कर देखना भी 
बड़ा सुखद लगता है ,अपने छोड़े हुए कदमों 
के निशां,जिन रास्तों से हम चल के आये 
उन्हें अपने पीछे  छोड़ आये ,यादे हमेशा हमारे 
साथ-साथ चलती हैं |


शायद वो फेसबुक के  मित्रों से  कुछ नाराज़ से हो गए थे ....और उन्होंने  ब्लॉगर  साथियों से गुज़ारिश की ...

आ अब लौट चलें ......

छोड़ फेसबुक की झूठी रंगीन, फ़रेबी,दुनिया से......... अपने ब्लोगर की आभासी दुनिया में ,...
जहाँ थम्स अप का अंगूठा नही, चापलूसी की टिप्पणी नही दिल से निकले प्यारे अल्फाजों की पुकार है दुलार है और समझाने के लिए प्यार से भरी फटकार भी है....सब अपने हैं न... बस इसी लिए, अपने आभासी परिवार के दुःख सुख के साथी...

आ अब लौट चलें ......


यह इनकी अंतिम पोस्ट थी ...... और ये चले गए कभी न लौटने के लिए .... 





आज के सक्रीय  ब्लॉगर्स  इनसे बहुत अच्छी तरह परिचित हैं ...... इनका जाना  सबको कितना व्यथित कर गया था ये मैंने बहुत से  ब्लॉगर्स   की पोस्ट पढ़ कर   जाना  ......उनके लेखन और उनकी आत्मीयता को हम बिसरा नहीं सकते .... 




पहली पोस्ट ...... मात्र दो शेर  लेकिन गहन भाव भरे हुए .....


देश के प्रति जो भाव प्रेषित किये उसको आपके साथ साझा कर ख़ुशी हो रही है ....

देव भूमि-सा है देश


यह रचना  2011  की है और  2021  में गणतंत्र दिवस पर उन्होंने क्या कहा ....एक नज़र डालते हैं ..... 

लाख ज़ुल्म-ओ-सितम किए जाएं

अम्न की आरती सजानी है


हिन्द की सरज़मीन जन्नत है

इस पे क़ुर्बान हर जवानी है


तआरुफ़ पूछिए न "वर्षा" का

मेघ और बूंद की इक कहानी है


इनकी अंतिम पोस्ट के रूप में इनकी पुस्तक .... ग़ज़ल जब बात करती है .... की समीक्षा प्रस्तुत करी गयी है ... और अब बस इनकी ग़ज़लें ही हम पाठकों से बात कर पाएँगी ...... आप हमें अपनी ग़ज़लों में मिलेंगी ..



और अब मैं आपके समक्ष ला रही हूँ कैलाश शर्मा जी का ब्लॉग ......


कैलाश शर्मा जी ....




आप इनके प्रोफाइल से इनके सभी ब्लॉग तक पहुँच सकते हैं ....इनके चार ब्लॉग्स हैं ..... एक में अध्यात्मिक यात्रा तो एक में बच्चों के लिए बाल कवितायेँ ...... और तीसरे में दुनियादारी की बातें हैं तो चौथे में मन की भावनाओं का वेग समाहित है . ...... मैं आपको इनकी कविताओं से मिलवा रही हूँ ......


नके ब्लॉग की पहली कविता ....


आयेगा कहाँ से गाँधी


नया साल आता है और सब आने वाले साल का स्वागत करते हैं ....लेकिन कभी कभी मन जाने वाले के लिए भी द्रवित हो  उठता  है ..... उसकी बानगी देखिये 

अलविदा ! वर्ष  2010 



एक और वर्ष
सीने में लाखों दर्द छुपाये 
घिसटते हुए 
दम तोड़ने वाला  है.


कितना सहा,
होठों पर लाकर मुस्कान 
दर्द को कितना छुपाना चाहा.
कब तक कोई
ग़मों से समझौता करता जाए,


और एक वर्ष पश्चात ........ एक नयी रचना .....


हे आने वाले वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन




  हे जाने वाले वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन,
नव जाग्रति लाने वाले, तेरा अभिनन्दन.


कुछ बीज नये बोये थे तुमने आँगन में,
प्रस्फुटित हो रहे अब मिट्टी के सीने से,
सोयी जनता ने ली है फिर से अंगड़ाई,
अनुपम उपलब्धि पर करते तेरा वन्दन.


इनके लिखे मुक्तक जीवन की सच्चाई को इंगित करते  हैं  .....इस पोस्ट में सब कुछ समेटना सरल नहीं .....आप जो पाठक पढना चाहें स्वयं ही पहुँचने का प्रयास करें ...... इनका लेखन मेरे मन के भावों से बहुत मेल  खाता  था ..... इसलिए मुझे बहुत  इनको पढना  हमेशा बहुत अच्छा लगा .. 

इनकी ब्लॉग पर अंतिम पोस्ट .....


जीवन यात्रा


कितनी दूर चला आया हूँ,

कितनी दूर अभी है जाना।

राह है लंबी या ये जीवन,

नहीं अभी तक मैंने जाना।


अपने इन जाने वाले साथियों को याद करते हुए अब ले चल रही हूँ आज के अपने ब्लॉगर्स की नयी रचनाओं की ओर ..... जो अपनी रचनाओं के माध्यम से सबको आकर्षित करते हैं .... 

सबसे पहले अनीता जी की रचना ....... आप नियमित और निरंतर  लेखन कर रही हैं ..... इसके लिए आपको मेरा नमन  .... 


खोया नहीं है जो 


खोया नहीं है जो 

खोया हुआ सा लगता है 

जैसे शशि झील में 

सोया हुआ सा लगता है 

न ही दूर गया उससे 

न  जा सकता है बाहर 

कोई बीज धरा की गहराई में जैसे 

बोया हुआ सा लगता है |


अनीता जी ने लिखा है खोया नहीं है जो ........ लेकिन अगली पोस्ट में सोचने पर मजबूर किया जा रहा कि

क्या इंसान हाथ पैर खो कर भी निखर सकता है ? आपका क्या ख़याल है ? पढ़िए जिज्ञासा जी की लघु कथा

बोनसाई



अरे तुम्हें ये क्या हो गया ?
कैसे इतनी चोट लग गई ? मैं तुम्हें कई दिनों से ढूंढ रही थी ।
तुम्हारा फोन नंबर भी बंद आ रहा था । 
 कहां थे तुम ? बगीचा कितना गन्दा हो गया है ।


नए साल में शरद जी दुआ मांग रही हैं कि काश ऐसा हो ..... 

नए साल में 


नए    साल   में    हर   नई   बात हो।
ख़ुशियों  की   हरदम ही  बरसात हो।

हो  इंसानियत    की    तरफ़दारियां
सभी  के  दिलों  में   ये  जज़्बात हो।

ऐसी दुआ तो बनती है ...... पिछला वर्ष बहुत लोगों के मन में एक सन्नाटा खींच गया उनमें से एक शरद जी आप भी हैं  और एक और ब्लॉगर  अंजना जी  ने अपनी दास्ताँ कुछ ऐसे लिखी है ....

नया साल सभी को मुबारक हो! 

मगर इस नए साल की खुशियां कुछ अधूरी हैं क्यूंकि अब सैकड़ों लोगों की दुनिया ही अधूरी हो गयी है! हमारा परिवार भी उन सैकड़ों लोगों में से है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को Covid में खो दिया। पिछले साल अप्रैल/मई में हमने अपनी मम्मी और बड़े मामू को Covid ke Delta varient के प्रहार में खो दिया। जब तक हमें पता लगा की मम्मी को covid है, बहुत देर हो चुकी थी.

  प्रतिभा  सक्सेना  जी ने नूतन  वर्ष से निवेदन किया है कि  विश्व के मंगल के लिए तुम आओ ... इस धरा पर उतरो ...


 मुझे आश्चर्य होता है कि हर एक के पास इस नए साल के लिए कितने विविध विचार हैं ....... 
रश्मि प्रभा जी की प्रखर लेखनी नए साल के मन के भावों को उकेर रही है .....सबसे ज्यादा मुझे प्रभावित किया उसके द्वारा  मृत्युंजय  जाप ने ..... आप भी पढ़ें इस रचना को .....


नया साल,

 कुछ शोर

कुछ सन्नाटे में आया

और एक पूरा दिन गुजारकर

अंगीठी के आगे बैठ गया है ।

बीते साल का सूप पीते हुए

(साल को ही सूप की उपमा दे दी  , बस गजब ही है )


चलिए ---बीते साल का सूप पीते हुए , अब मुझे इजाज़त दें ........  सभी पाठकों की प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा ..... आपके सुझावों का स्वागत है ..... सामर्थ्य अनुरूप आपकी बात को पूरा करने का हमेशा प्रयास रहता है ..... 

फिर मिलते हैं एक नयी हलचल के साथ  नमस्कार .... 

संगीता स्वरुप 









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