शुक्रवारीय अंक
तट पर है तरुवर एकाकी,
नौका है, सागर में,
अंतरिक्ष में खग एकाकी,
तारा है, अंबर में,
भू पर वन, वारिधि पर बेड़े,
नभ में उडु खग मेला,
नर नारी से भरे जगत में
कवि का हृदय अकेला!
-हरिवंशराय बच्चन
आज है

आपसभी का स्नेहिल अभिवादन
आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-
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उसके हाथों में
आश्वस्ति की गंध थी
जिसे महसूस किया जा सकता था
अपने देह में किसी कस्तूरी मृग की तरह
वक्त, इतना वक्त, देता है कभी - कभी
इक ग़ज़ल भूली हुई हम गुनगुना बैठे।
लौटकर हम अपनी दुनिया में, बड़े खुश हैं
काँच के टुकड़ों से, गुलदस्ता बना बैठे ।
काल के क़दमों से तेज़
तीव्र वेग से दौड़ता कुंठित मन-सा
सूखे पात-सा लिप्सा में लीन
तृष्णा की टहनी पर बैठा
काया को कलुषित करता।
अनुसरण करना
कोई उनसे सीखे
प्रेम-सौहार्द
कोई उनसे सीखे
यह चींटी ही है जो
पात पर लगे भोजन को
ना अकेले भोग लगाती है
'वसुधैव कुटुम्बकम् ' का पाठ
यह जाति ...
अकेले सिद्ध कर जाती है ।
हर जगह मौज़ूद पर सुनते कहाँ हो इसलिए,
लिख रखी है एक अर्ज़ी कुछ पता दे देवता।
शौक से तुमने गढ़े हैं आदमी जिस ख़ाक से,
और थोड़ी-सी नमी उसमें मिला दे देवता।
लिख रखी है एक अर्ज़ी कुछ पता दे देवता।
शौक से तुमने गढ़े हैं आदमी जिस ख़ाक से,
और थोड़ी-सी नमी उसमें मिला दे देवता।
पीठ पे बोरा फटा, हाथ में थामे बलछी
फटी शर्ट पतलून, पैर में चप्पल टूटी
दौड़ दौड़ कर कूड़ा माँगें घर घर बच्चे
दिल को देते दर्द कबाड़ में डूबे बच्चे







