शुक्रवारीय प्रस्तुति में
आप सभी का
स्नेहिल अभिवादन।
----//---
व्यक्तिगत बुद्धिमत्ता के प्रदर्शन का प्रचलन।
गतिशील परिदृश्यों में अनवरत प्रश्नों का तरन ।
स्पंदित विचारों का स्थान घेरती मृत शब्दावली,
महत्वकांक्षी रिसाव, बौद्धिक क्षुद्रता का वरण।
बाज़ार लगा रखा है हमने भीतर से बाहर तक,
ज्ञान की प्याली में उफ़ान या विवेक का क्षरण?
#श्वेता
आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-
आप सभी का
स्नेहिल अभिवादन।
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व्यक्तिगत बुद्धिमत्ता के प्रदर्शन का प्रचलन।
गतिशील परिदृश्यों में अनवरत प्रश्नों का तरन ।
स्पंदित विचारों का स्थान घेरती मृत शब्दावली,
महत्वकांक्षी रिसाव, बौद्धिक क्षुद्रता का वरण।
बाज़ार लगा रखा है हमने भीतर से बाहर तक,
ज्ञान की प्याली में उफ़ान या विवेक का क्षरण?
#श्वेता
आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-
आज मौसम का रूख़ जब उसे समझ आया
हाँ! मौसम की ये फितरत
ना समझ पाती थी....
उसकी खुशियों के खातिर
कुछ भी कर जाती थी
उसकी गर्मी और सर्दी में
खुद को उलझाया....
आज मौसम का रुख
जब उसे समझ आया.....
हाँ! मौसम की ये फितरत
ना समझ पाती थी....
उसकी खुशियों के खातिर
कुछ भी कर जाती थी
उसकी गर्मी और सर्दी में
खुद को उलझाया....
आज मौसम का रुख
जब उसे समझ आया.....
मैं यहीं हूँ
कहाँ जाऊँगा,
एक प्रेमपत्र हूँ
उड़ता हुआ सा
आँधियों में,
ग़र बारिश हुई
यहीं गिरकर
भींग जाऊँगा...
हर देहरी पर विराजमान हैं,मैंने इस बार ईश्वर को तड़पते देखा,सड़कों, पुलों और अंधेरी कोठरियों की पनाह लिए,भूखे बच्चों और गर्भवती स्त्रियों के कोटरों में,ईश्वर मरता रहा ;

वह पूनम का चाँद ही तो है खिला-खिला
वही अपना है जंगल में जैसे
कोई बिछड़ा मीत मिला
जानना नहीं है उसे
अज्ञेय है वह
पाना भी नहीं है
कभी खोया ही नहीं वह
जागना है
गदराई अमिया को देख कर खीझती थीं
ये तोते चोंच मार कर सारी अमिया
ऊपर पेड़ पर ही खराब कर देते हैं
ये नहीं कि दो चार नीचे भी गिरा दें !
फिर मैं कभी गुलेल से ,कभी पत्थर से
तो कभी पेड़ पर चढ़ कर तुम्हारे लिए
झोली भर अमिया तोड़ दिया करता था !
और चलते-चलते पढ़िये
एक पुस्तक को सूक्ष्मता से आत्मसात कर लिखी गयी
सहज,सरल,पाठकों से संवाद स्थापित करती
विश्लेषणात्मक
समीक्षा
उपन्यास की सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इस की रचना लेखिका- कविता सिंह और लेखक- सौरभ दीक्षित "मानस" ने मिल कर किया है। चूँकि एक लेखक हैं और दूसरी लेखिका, तो ऐसे में मेरे अनुसार (हो सकता है मैं गलत भी होऊं) इनको "लेखकद्वय" कहना सही नहीं होगा; क्योंकि यहाँ संपादक (हिन्दी व्याकरण में सम्पादिका शब्द व्यवहार में नहीं लाते हैं) शब्द वाली मजबूरी नहीं है। तो ऐसे में "लेखनद्वय" शब्द का प्रयोग करना यथोचित होगा .. शायद ...।
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सुनिये
शिवकुमार बटावली की नफ़ासत
सुनिये
शिवकुमार बटावली की नफ़ासत
हम-क़दम का एक सौ अट्ठाइसवाँ विषय
यहाँ देखिए
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कल का अंक पढ़ना न भूले कल
आ रही हैं विभा दीदी
विशेेेष प्रस्तुति के साथ।
आ रही हैं विभा दीदी
विशेेेष प्रस्तुति के साथ।



