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मंगलवार, 26 मई 2020

1775...हवा युगों से सबने बाँटी...

सादर अभिवादन।

श्रमिक रेलगाड़ियाँ 
राह भटक गईं 
है न आश्चर्यजनक ख़बर,
लंबे लॉकडाउन में 
व्यवस्था का मतिभ्रम है  
या भूखे मज़दूरों को 
क़्वारन्टाइन में रखने के 
ये हैं उपाय लचर?

-रवीन्द्र

आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-    


 
हवा युगों से सबने बाँटी
तपिश धूप की, दावानल की
जल का स्वाद कभी ना बदला  
पीने वाला हो कोई भी ! 


मेरी फ़ोटो 
धुंधले होते तारों के साथ
उठ जाती हो रोज मेरे पहलू से 
कितनी बार तो कहा है  
जमाने भर को रोशनी देना तुम्हारा काम नहीं


 
सवाल था, या शून्य काल?
लिखता भी क्या, मैं शून्य में घिरा....
अवनि पर, गुम थी ध्वनि!
लौट कर आती थी, गूंज कोई,
वियावान, था हर तरफ,
दब से चुके थे, सन्नाटों में सृजन,
सारे, एक-एक कर!


alt='CORONAPOETRY' 
अज्ञानता,
मूर्खता, गरीबी, मासूमियत
ये सब पाप नहीं हैं,
जैसे प्रकृति-पशु-पक्षी के
कर्मों में पाप नहीं है,
पाप है वहाँ जहाँ ज्ञान है,
बुद्धि है, छल है यानी
जहाँ नीयत में खोट है,
दिखावा है - ढोंग है,
और ईश्वर बीच-बीच में
इसी पर करता चोट है...


 birds in the sky | Tumblr 
रघुवीर, उस लिस्ट को रद्द कर दो जिसमें मिल के पाँच सौ मजदूरों को नौकरी से हटाने की बात कही गई है| ये लौकडाउन कभी कभी तो खत्म होगा ही, हम उन्हें बिना काम के भी तनख्वाह देते रहेंगे।’ 
******
  
हम-क़दम के अगले अंक का विषय है-

'शलभ'

इस विषय पर सृजित आप अपनी रचना आगामी शनिवार (30 मई 2020) तक कॉन्टैक्ट फ़ॉर्म के माध्यम से हमें भेजिएगा। 
चयनित रचनाओं को आगामी सोमवारीय प्रस्तुति (01 जून 2020) में प्रकाशित किया जाएगा। 

उदाहरणस्वरूप  ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित महान कवयित्री महादेवी वर्मा जी की कविता-

"ओ पागल संसार !
माँग न तू हे शीतल तममय
जलने का उपहार !

करता दीपशिखा का चुंबन,
पल में ज्वाला का उन्मीलन;
छूते ही करना होगा
जल मिटने का व्यापार !
ओ पागल संसार !

दीपक जल देता प्रकाश भर,
दीपक को छू जल जाता घर,
जलने दे एकाकी मत आ
हो जावेगा क्षार !
ओ पागल संसार !

जलना ही प्रकाश उसमें सुख
बुझना ही तम है तम में दुख;
तुझमें चिर दुख, मुझमें चिर सुख
कैसे होगा प्यार !
ओ पागल संसार !

शलभ अन्य की ज्वाला से मिल,
झुलस कहाँ हो पाया उज्जवल !
कब कर पाया वह लघु तन से
नव आलोक-प्रसार !
ओ पागल संसार !

अपना जीवन-दीप मृदुलतर,
वर्ती कर निज स्नेह-सिक्त उर;
फिर जो जल पावे हँस-हँस कर
हो आभा साकार !
ओ पागल संसार !"

(नीरजा से)

-महादेवी वर्मा 

साभार :हिंदी समय 


आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे अगली  प्रस्तुति में। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

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