सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

अपने आस पास का फैला वो यथार्थ। जिसे आप देखते तो थे मगर
उसे उस नजर से देखना चूक गये थे जिस नजर से अनूप शुक्ला उसे देखते हैं।
आप अचरज में पड़ जायेंगे। अरे, इसे ऐसे भी सोच सकते हैं क्या, और
फिर पढ़ कर कहेंगे कि हाँ, सोच तो सकते थे। एक होती है मुस्कान।
आप देखते हैं मुस्कान और फुरसतिया देखते हैं उसी में कोलगेटिया मुस्कान।
जिसमें दिखे दाँत ज्यादा सफेद। छोटी छोटी से बातें। मगर अंदाज जुदा जुदा।

कुछ लोग लंबा लिखने को ही बेवकूफी मानते हैं.
इसलिए ये सीरीज थोड़ी लंबी चलेगी. बहरहाल मेरे कहने का मकसद
सिर्फ इतना है कि बेवकूफी सबसे आसान काम है. सबको करना चाहिए.
बिना किए भी होती रहती है अक्सर. आख़िर में परसाई का लिखा छोड़ के जा रहा हूं.

हद दर्जे की मक्कारी है उन की बातों मे
फिर भी हम उन से बाते करते है
सपने दिखाते है वो दिन मे
फिर भी हम सुनते है उनकी
इस कमाल को हम क्या कहेगे

मैं तुम्हारा हाल पूछकर अपनी बेवकूफी का
प्रमाण पेश नहीं करूंगा. क्योंकि प्यारे,
तुम अच्छे के सिवा और हो ही क्या सकते हो.
मैं मान ही नहीं सकता कि तुम्हारा भी मिजाज
नरम—गरम, तोला—माशा हो सकता है.
इस भूल भुलैया दुनिया में कुछ लोग आपस में टकरा ही जाते हैं,
जिन्हें देख या सोच के आपको लगता है कि अरे वाह !
आज भी ऐसे लोग मिलते हैं या आज भी ऐसा रिश्ता बनता है।
हमारी मैम को भी उनकी टीम में कोई ऐसा ही मिल गया,
जो उन्हें पैम्पर करता…उन्हें हंसाता रहता…नौटंकी करता।
नाम था उसका ‘लबरी'
><><
अब बारी है विषय की
105 नम्बर का विषय
एक चित्र है
105 नम्बर का विषय
एक चित्र है
इसी को आधार मान
कर रचना लिखनी है
अंतिम तिथिः 25 जनवरी 2020
रचनाएँ मेल द्वारा ही
अंतिम तिथिः 25 जनवरी 2020
रचनाएँ मेल द्वारा ही

