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शनिवार, 14 दिसंबर 2019

1611... कोई फर्क नहीं पड़ता...


सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष


फ़ोटो का कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है.

13 दिसम्बर 2019 को यहाँ पहुँची हूँ
दिन-रात का फर्क है कुछ ज्यादा ही
जहाँ से आई हूँ और अभी जहाँ हूँ

कोई फर्क नहीं पड़ता

कोई फर्क नहीं पड़ता

कोई फर्क नहीं पड़ता
इस देश में राजा हिन्दू हो या मुसमान,
जनता तो बेचारी लाश है,
हिन्दू राजा हुआ तो , जला दी जाएगी
और मुसलमान राजा हुआ
तो दफना दी जाएगी

मैं हूँ इस देश का गौरव

किन्तु खेद क़ी समय से नहीं रह सक़ी अछूती,
दिशा देती थी जो सबको, आज खुद ही है भटकी,
जिसे थे सुलझाने समस्या, आज झेल रही है समस्या,
आज संशय में शायद, क्या मै हूँ देश बनाती?

गुनाह

किसके थे गुनाह , मैं ये सोचता हूँ
क्यूँ खो गया था मैं , ये पूछता हूँ
पर क्यूँ पूछता हूँ , जब मैं ये जानता हूँ
करता हूँ स्वयं स्वांग , पर नहीं मानता हूँ
ये सब किया धरा , मेरा ही घेरा है
गुनाहों का लगाया यहाँ , मैंने ही डेरा है

गज़ल शिल्प

मेरे दिल की गहराइयों को न छूना
अकेला हूँ , तन्हाइयों को न छूना |

हर इक साज़ मेरे दिल का है टूटा
शिकिस्ताँ हैं शहनाईयों को न छूना।

प्रवृत्तियाँ

प्रकृति जहां एकांत बैठि निज रूप संवारति।
पल-पल पलटति भेष छनिक छवि छिन-छिन धारति॥
-
सुंदर सर है लहर मनोरथ सी उठ मिट जाती।
तट पर है कदम्ब की विस्तृत छाया सुखद सुहाती॥

मोह-भंग

भावहीन, संवेदनहीन
निर्दयी,बर्बर प्रस्तर प्रहार
शब्दाघात के आघात
असहनीय वेदना से
तड़पकर मर जाती है 
प्रकृति की कविताएँ,

पुन: मिलेंगे
><


अब बारी है विषय की
99 वां विषय
अलाव
उदाहरण
आओ, अलाव जलाएँ,
सब बैठ जाएँ साथ-साथ,
बतियाएँ थोड़ी देर,
बांटें सुख-दुख,
साझा करें सपने,
जिनके पूरे होने की उम्मीद 
अभी बाक़ी है.
रचनाकार हैं
ओंकार जी

अंतिम तिथिः 14 दिसम्बर 2019
मेल द्वारा शाम तीन बजे तक
प्रकाशन तिथिः 16 दिसम्बर 2019
रिपीट विषय है..
कृपया पुरानी रचनाएं न भेजें



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