सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
कब कौन कितना किसको
अपना निशाना बना रहा
कंधे इतने मजबूत नहीं
बंदूक रखने के पहले तौल तो लेते
उतना ही बोलना जितना जरूरी हो
सीखने में एक उम्र गुजर गई
ना जाने कब पीछा छोड़ेगा दो चित्तापन
और जाने कब उतरा जा सकेगा
फैल जाता है
जीवन का खालीपन
और गहराता है
लोग सांत्वना के
दो बोल बोलते हैं
और हार का एहसास
मन ही मन में हैं गारियाँ देतें
पर ऊपर से मुस्कुराते हैं
रखते दिल के अंदर खोट ही खोट
और सिर्फ झूठा प्यार जताते हैं
यहाँ सब दिखते हैं तो गहरे गहरे पर
ये मुखौटे कोई उतार नहीं पाते हैं
राम राम मुख से हैं सब जपते
और रावण बन पीठ में खंजर घोप जाते हैं
जिसका चेहरा जितना बनावटी
वह उतना ही सफल है
छल प्रपंच से भरे खेल में
उसकी दांव प्रबल है
अपनापन का भाव कहाँ यहाँ पर
केवल स्वार्थ निहित है
मुखौटे
रामलीला में अगर कुंभकर्ण का मुखौटा है तो वह कुंभकर्ण का ही पात्र है।
जीवन में यह द्वैत है। अगर जीवन पर रंगमंच खेला जाए तो
फिर से मुखौटे लगाने होंगे जो वास्तविक चेहरे से भिन्न होंगे,
क्योंकि रंगमंच में तो सच दिखाना है। इसलिए
आधुनिक रंगमंच में कई भावों को प्रस्तुत करने के लिए मुखौटे लगते हैं।
दो चेहरे
देखते हैं आयना तो पहला चेहरा नजर आता है,
और दूसरा तो बस आंखे बंद करने पर दिख जाता है।
जिन बुराइयों को छिपाता है तू जमाने से,
उन्हें दूसरा चेहरा ही तुझे दिखाता है।
फिर भी न जाने क्यों ?
तुझे पहला चेहरा ही भाता है।
मुखौटे
रामलीला में अगर कुंभकर्ण का मुखौटा है तो वह कुंभकर्ण का ही पात्र है।
जीवन में यह द्वैत है। अगर जीवन पर रंगमंच खेला जाए तो
फिर से मुखौटे लगाने होंगे जो वास्तविक चेहरे से भिन्न होंगे,
क्योंकि रंगमंच में तो सच दिखाना है। इसलिए
आधुनिक रंगमंच में कई भावों को प्रस्तुत करने के लिए मुखौटे लगते हैं।
दो चेहरे
देखते हैं आयना तो पहला चेहरा नजर आता है,
और दूसरा तो बस आंखे बंद करने पर दिख जाता है।
जिन बुराइयों को छिपाता है तू जमाने से,
उन्हें दूसरा चेहरा ही तुझे दिखाता है।
फिर भी न जाने क्यों ?
तुझे पहला चेहरा ही भाता है।
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फिर मिलेंगे
इस सप्ताह का विषय
छियानबेवां विषय
बिटिया
उदाहरण
आज भी तो नवजात बिटिया के
जन्म पर,भविष्य के भार से
काँपते कंधों को संयत करते
कृत्रिम मुस्कान से सजे अधरों और
सिलवट भरे माथे का विरोधाभास लिये
"आजकल बेटियाँ भी कम कहाँ है"
जैसे शब्दांडबर सांत्वना की थपकी देते
माँ-बाबू पर दया दृष्टि डालते परिजन की
"लक्ष्मी आई है"के घोष में दबी फुसफुसाहटें
खोखली खुशियाँ अक्सर पूछती हैं
बेटियों के लिए सोच ज़माने ने कब बदली?
कलमकारः सखी श्वेता सिन्हा
अंतिम तिथिः 23 नवम्बर 2013
प्रकाशन तिथिः 25 नवम्बर 2013
प्रविष्ठिया मेल द्वारा सांय 3 बजे तक
फिर मिलेंगे
इस सप्ताह का विषय
छियानबेवां विषय
बिटिया
उदाहरण
आज भी तो नवजात बिटिया के
जन्म पर,भविष्य के भार से
काँपते कंधों को संयत करते
कृत्रिम मुस्कान से सजे अधरों और
सिलवट भरे माथे का विरोधाभास लिये
"आजकल बेटियाँ भी कम कहाँ है"
जैसे शब्दांडबर सांत्वना की थपकी देते
माँ-बाबू पर दया दृष्टि डालते परिजन की
"लक्ष्मी आई है"के घोष में दबी फुसफुसाहटें
खोखली खुशियाँ अक्सर पूछती हैं
बेटियों के लिए सोच ज़माने ने कब बदली?
कलमकारः सखी श्वेता सिन्हा
अंतिम तिथिः 23 नवम्बर 2013
प्रकाशन तिथिः 25 नवम्बर 2013
प्रविष्ठिया मेल द्वारा सांय 3 बजे तक