स्नेहिल अभिवादन
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पम्मी जी की अनुपस्थिति में
आज की शुरुआत
कविश्रेष्ठ मैथिलीशरण गुप्त
की कुछ पंक्तियों के साथ...
नर हो, न निराश करो मन को
निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को।
आइये पढ़ते हैं आज की रचनाएँ-
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चिड़िया बनकर उड़ जाते हैं
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पम्मी जी की अनुपस्थिति में
आज की शुरुआत
कविश्रेष्ठ मैथिलीशरण गुप्त
की कुछ पंक्तियों के साथ...
नर हो, न निराश करो मन को
निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को।
आइये पढ़ते हैं आज की रचनाएँ-
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चिड़िया बनकर उड़ जाते हैं
अल्फ़ाज़ जुबां तक आते आते रुक जाते हैं
कलम उठाकर उनको लिखना भी चाहूँ,
तो चिड़िया बनकर उड़ जाते हैं
इधर उधर को मुड़ जाते हैं, छुप जाते हैं
अल्फ़ाज़ जुबां तक आते-आते रुक जाते हैं.....
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“माइंड” में कुछ ऐसा ही “इम्प्रे-शन” है
मिलने पर तो इतने तल्ख़ नहीं लगते
पर “सोशल” मंचों पर दिखती “टेन्शन” है
बतलाता है अब “इस्टेटस” “सेल्फी” का
खुश है बच्चा या कोई “डिप्रे-शन” है
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कुछ कहे अनकहे
जुमले थे
कुछ सुने अनसुने
किस्से थे
कुछ चोटों का
मर्म वही था
कुछ दुखड़ोंका
गम भी वहीं था
कुछ आंखों की
नरमी थी
कुछ सांसों की
गर्मी थी
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और इसलिए
वह मौका देखकर
चूस लेता है खून
उन ज़िंदा इनसानों का
इस उम्मीद से
कि उनके नसों में
दौड़ता गर्म रक्त
भर देगा
उसके मरे ठंडे पाषाण हृदय में
ज़िन्दगी की गर्माहट
करा देगा
उसे फिर से एहसास
कि कैसा होता था
जिंदा होना
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शरारत निगाहें कि करने लगी थीं
नजर से हमें क्यों छुपाना न आया।
कभी पास अपने बुलाना न आया
का स्वर्ण पताका ,
जग -भर में लहराए ।
झूठ , फरेब, मक्कारी,
जल के बुलबुले -सा ढह जाए।
शान-घमंड
विद्वेष-भावना,
कभी न आए पास।
सब पर सबको मोह
रहे, सबपर सबको विश्वास।






