।।प्रात:वंदन।।
अल्फाज जो उगते, मुरझाते, जलते, बुझते
रहते हैं मेरे चारों तरफ,
अल्फाज़ जो मेरे गिर्द पतंगों की सूरत उड़ते
रहते हैं रात और दिन
इन लफ़्ज़ों के किरदार हैं, इनकी शक्लें हैं,
रंग रूप भी हैं-- और उम्रें भी!
गुलजार
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इसी शब्दों के रंग-रूप को जानने ,समझने के लिए निम्न लिंकों को पढ़ें..रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें..✍
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आदरणीय दिगंबर नासवा जी,
आदरणीय हेमंत दास 'हिम' जी,
आदरणीय ओंकार जी,
आदरणीया अनुपमा पाठक जी,
आदरणीया सुषमा वर्मा जी..
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धूप की बैसाखियों को भूल जा
दिल में हिम्मत रख दियों को भूल जा
व्यर्थ की नौटंकियों को भूल जा
मीडिया की सुर्ख़ियों को भूल जा
16 जून 2019 दिन रविवार को फादर्स डे
यानी पितृ दिवस के उपलक्ष्य में लेख्य मंजूषा पटना के द्वारा काव्योत्सव मनाया गया।
यानी पितृ दिवस के उपलक्ष्य में लेख्य मंजूषा पटना के द्वारा काव्योत्सव मनाया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था की अध्यक्ष श्रीमती विभा रानी श्रीवास्तव ने किया
तथा मंच संचालन दिल्ली से आई पम्मी सिंह ने किया। इस अवसर पर विभा रानी श्रीवास्तव
ने कहा कि बच्चों को संस्कार अगर मां देती है तो पिता सहने और जुझने की शक्ति..
तथा मंच संचालन दिल्ली से आई पम्मी सिंह ने किया। इस अवसर पर विभा रानी श्रीवास्तव
ने कहा कि बच्चों को संस्कार अगर मां देती है तो पिता सहने और जुझने की शक्ति..
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उस घर में एक लड़की थी,
सुन्दर-सी,मासूम-सी,
रह-रह कर खिलखिलानेवाली,
उसकी हंसी मोहल्ले में गूंजती थी.
बड़े सलीके से सजती थी वह,
रंगों का अच्छा सेंस था उसको
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निरुद्देश्य पैदल चलते हुए
रास्ते-दर-रास्ते अपने पाँव से नापते हुए
गति को आयाम मिलता रहा
जितना चलते चले गए
धूल पटे रास्तों पर
लगातार...
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तुम्हे आज लिखती हूँ मैं,
फिर इक बार तुम्हे लिखती हूँ मैं...
उजली सुबह लिखती हूँ मैं,
ढलती शामे लिखती हूँ मैं..
गहरी खमोश राते लिखती हूँ मैं..
फिर इक बार तुम्हे लिखती हूँ मैं..
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍




