स्नेहिल अभिवादन
-------
गरमी के मौसम के दस्तक के साथ ही
कुछ नारे बुलंद हो जाते हैं।
"बिन पानी सब सून"
"जल ही जीवन है"
"पानी की एक भी बूँद कीमती है"
इन नारों को
मात्र मौसम के अनुरूप स्लोगन बनाकर
ही प्रयोग नहीं करना चाहिए बल्कि
आत्मसात करने की आवश्यकता है।
पानी के बिना धरती पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।
धरती का 75 प्रतिशत भाग जल है।
पर जो जल जीवों के जीवन के लिए संजीवनी जैसी है उसका प्रतिशत मात्र 2.7 है।
हम मानवोंं की लापरवाही से उत्पन्न
पारिस्थितिकीय असंतुलन की वजह से
गंभीर जल संकट
आप भी महसूस करते है न?
★
अब देर न करते हुये
चलिए आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-
★★★
पथिक ! मैंने क्यों बटोरे
हम आशाओं पर जीते हैं
छ्ल कपट, प्रेम का भेष धरे
मैत्री का जाल बिछाता है।
कंचन पात्रों में जहर भरे,
अमृत का स्वांग रचाता है।
जीवन के चौराहों पर अब,
सारी राहें भरमाती हैं।
दुनियादारी के दाँव पेच,
दुनिया ही यहाँ सिखाती है ।
जीने की कठिन लड़ाई में,
दीनों के सब दिन बीते हैं।
नमक ग़मों का
-------
गरमी के मौसम के दस्तक के साथ ही
कुछ नारे बुलंद हो जाते हैं।
"बिन पानी सब सून"
"जल ही जीवन है"
"पानी की एक भी बूँद कीमती है"
इन नारों को
मात्र मौसम के अनुरूप स्लोगन बनाकर
ही प्रयोग नहीं करना चाहिए बल्कि
आत्मसात करने की आवश्यकता है।
पानी के बिना धरती पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।
धरती का 75 प्रतिशत भाग जल है।
पर जो जल जीवों के जीवन के लिए संजीवनी जैसी है उसका प्रतिशत मात्र 2.7 है।
हम मानवोंं की लापरवाही से उत्पन्न
पारिस्थितिकीय असंतुलन की वजह से
गंभीर जल संकट
आप भी महसूस करते है न?
★
अब देर न करते हुये
चलिए आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-
★★★
पथिक ! मैंने क्यों बटोरे
हंसी- हँसी में लिख दिए -
दर्द संग अनुबंध मैंने ,
थाम रखे जाने कैसे-
आसूंओ के बन्ध मैंने ;
टीसते मन को लिए-
संजोये भीतर सागर खारे !!
★★★★★हम आशाओं पर जीते हैं
छ्ल कपट, प्रेम का भेष धरे
मैत्री का जाल बिछाता है।
कंचन पात्रों में जहर भरे,
अमृत का स्वांग रचाता है।
जीवन के चौराहों पर अब,
सारी राहें भरमाती हैं।
दुनियादारी के दाँव पेच,
दुनिया ही यहाँ सिखाती है ।
जीने की कठिन लड़ाई में,
दीनों के सब दिन बीते हैं।
नमक ग़मों का
पानी में आँखों के भीतर
ये नमक ग़मों का घुलता है
जब नेह की होती है बारिश
तब मैल हृदय का धुलता है
★★★★★
पहाड़ भी मरते हैं
आप का होना था
एक बाँध सरीखा
आड़ी तिरछी शांत चंचल फुहारों को
समेट दिशा दे दशा निर्धारित करते
उर्जवित करते निष्प्राण विचारों को
पहाड़ भी मरते हैं
आप का होना था
एक बाँध सरीखा
आड़ी तिरछी शांत चंचल फुहारों को
समेट दिशा दे दशा निर्धारित करते
उर्जवित करते निष्प्राण विचारों को
★★★★★★
रेपिस्ट हो या तेज़ाब डालने वाले लोग....आख़िर इन्हें बचाता कौन है? चुनावों में इन विषयों पर बात करने से नेतागण बचते क्यों हैं? नागरिकों की सुरक्षा किसकी जिम्मेदारी है? अपराधियों को दंड देना किसका कर्त्तव्य है?
★★★★★
आज का यह अंक आपको कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं की सदैव प्रतीक्षा रहती है।
हमक़दम के अंक के लिए
कल का अंक पढ़ना न भूले
कल आ रही है विभा दी
विशेष प्रस्तुति के साथ।




