।।उषा स्वस्ति।।
"आ गए तुम?
द्वार खुला है, अंदर आओ..!
पर तनिक ठहरो..
ड्योढी पर पड़े पायदान पर,
अपना अहं झाड़ आना.!
मधुमालती लिपटी है मुंडेर से,
अपनी नाराज़गी वहीं उड़ेल आना..!
तुलसी के क्यारे में,
मन की चटकन चढ़ा आना..!
अपनी व्यस्ततायें, बाहर खूंटी
पर ही टांग आना.!"
निधि सक्सेना
इन खूबसूरत विचारों के साथ नज़र डालें आज की लिंकों पर...✍
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खिलती हुई धूप के दुबारा आने की उमंग
स्याह रात को दिन के लील लेने के बाद जागती है
सर्दी के इंतज़ार में देवदार के ठूंठ न सूखें
तो बर्फ की सफ़ेद चादर तले प्रेम के अंकुर नहीं फूटते
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द्वितीय रचना में आप सभी आंनद ले..आदरणीय विश्वमोहन जी की , कुछ,कुछ सपनों में देखा सपना -- फिर भी हो ना सका अपना !!!!
मैं आई.सी.सी. के समक्ष लज्जावत सर झुकाए खड़ा था. मुझ पर 'वर्क-प्लेस पर वीमेन के सम्मान को आउटरेज' करने का इलज़ाम था. यह आरोप मेरे लिए बिलकुल अप्रत्याशित था.मेरी शुचिता और मेरे निर्मल चरित्र का सर्वत्र डंका बजता था. स्वयं आई.सी.सी. के सदस्य हैरान थे. लोगों की अपार भीड़ भी आहत मुद्रा में बाहर खड़ी थी. मुझे तो काठ मार गया था . अभियोग की बात..
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क्या आप को पता है एक ऐसा वेद भी है जिसे शूद्र भी पढ़ सकते है |
क्या आप पांचवे वेद के बारे में जानतें हैं |
कभी सोचा है अप्सराओं का जन्म क्यों कब और कैसे हुआ |
क्या अप्सराओं के भी विवाह होते हैं |..
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चतुर्थी प्रस्तुति के अंतर्गत मौसम के अनुरूप ..
कुहासे की चिलमन से झाँकते सूर्य ने
भेज दीं कुछ किरणें भूमि पर
वे लगीं बड़ी भली
सर्द शरीरों में पड़ गई जान
खुल गए अंग..
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किसी के आगे अब खुलने को हम तैयार नही
दोस्त बहुत हैं यहाँ कोई यार नही,
मुश्किलों का समुन्दर हैं,तकलीफों के पहाड़ हैं,
इस ताल्लुख़ से उबरने के कोई आसार नही,
चलते हुए एक और रचना
उलूक के दरबार से
गाँधी खुद
एक इतिहास
और इतिहास
शुंड भिशुंड हो गया
गली मोहल्ले
शहर जिले
प्रदेश से
बाहर कहीं
‘उलूक’
कौन
जानता है तुझे
चलते हुए एक और रचना
उलूक के दरबार से
गाँधी खुद
एक इतिहास
और इतिहास
शुंड भिशुंड हो गया
गली मोहल्ले
शहर जिले
प्रदेश से
बाहर कहीं
‘उलूक’
कौन
जानता है तुझे
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जाते जाते पुरानी गलियों से..
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हम-क़दम का नया विषय
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'...✍




