श्रीधर पाठक
11जनवरी, 1860 - 13 सितम्बर 1928
11जनवरी, 1860 - 13 सितम्बर 1928
भारत के प्रसिद्ध कवियों में से एक थे। वे स्वदेश प्रेम, प्राकृतिक सौंदर्य तथा समाजसुधार की भावनाओं के कवि थे। उन्हें 'कविभूषण' की उपाधि से सम्मानित किया गया था। हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेज़ी पर
श्रीधर पाठक का समान अधिकार था।
श्रीधर पाठक का समान अधिकार था।
श्रीधर पाठक ने ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों
में अच्छी कविता की हैं। उनकी ब्रजभाषा सहज
और निराडम्बर है, परंपरागत रूढ़ शब्दावली का
प्रयोग उन्होंने प्रायः नहीं किया है। खड़ी बोली में
काव्य रचना कर श्रीधर पाठक ने गद्य और
पद्य की भाषाओं में एकता स्थापित करने का एतिहासिक कार्य किया। खड़ी बोली के वे
प्रथम समर्थ कवि भी कहे जा सकते हैं। यद्यपि
इनकी खड़ी बोली में कहीं-कहीं ब्रजभाषा के
क्रियापद भी प्रयुक्त है, किन्तु यह क्रम महत्वपूर्ण
नहीं है कि महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा
'सरस्वती' का सम्पादन संभालने से पूर्व ही
उन्होंने खड़ी बोली में कविता लिखकर
अपनी स्वच्छन्द वृत्ति का परिचय दिया।
देश-प्रेम, समाज सुधार तथा प्रकृति-चित्रण
उनकी कविता के मुख्य विषय थे। उन्होने बड़े
मनोयोग से देश का गौरव गान किया है, किन्तु
देश भक्ति के साथ उनमें भारतेंदु कालीन
कवियों के समान राजभक्ति भी मिलती है।
में अच्छी कविता की हैं। उनकी ब्रजभाषा सहज
और निराडम्बर है, परंपरागत रूढ़ शब्दावली का
प्रयोग उन्होंने प्रायः नहीं किया है। खड़ी बोली में
काव्य रचना कर श्रीधर पाठक ने गद्य और
पद्य की भाषाओं में एकता स्थापित करने का एतिहासिक कार्य किया। खड़ी बोली के वे
प्रथम समर्थ कवि भी कहे जा सकते हैं। यद्यपि
इनकी खड़ी बोली में कहीं-कहीं ब्रजभाषा के
क्रियापद भी प्रयुक्त है, किन्तु यह क्रम महत्वपूर्ण
नहीं है कि महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा
'सरस्वती' का सम्पादन संभालने से पूर्व ही
उन्होंने खड़ी बोली में कविता लिखकर
अपनी स्वच्छन्द वृत्ति का परिचय दिया।
देश-प्रेम, समाज सुधार तथा प्रकृति-चित्रण
उनकी कविता के मुख्य विषय थे। उन्होने बड़े
मनोयोग से देश का गौरव गान किया है, किन्तु
देश भक्ति के साथ उनमें भारतेंदु कालीन
कवियों के समान राजभक्ति भी मिलती है।
उनके द्वारा रचित एक देशभक्ति कविता
निज स्वदेश ही एक सर्व-पर ब्रह्म-लोक है
निज स्वदेश ही एक सर्व-पर अमर-ओक है
निज स्वदेश विज्ञान-ज्ञान-आनंद-धाम है
निज स्वदेश ही भुवि त्रिलोक-शोभाभिराम है
सो निज स्वदेश का, सर्व विधि, प्रियवर, आराधन करो
अविरत-सेवा-सन्नद्ध हो सब विधि सुख-साधन करो
★★★★★
★★★★★
अब चलिए आज की रचनाओं का आनंद लेते हैं....
★
आदरणीय विश्वमोहन जी
सागर के बीच
उसकी छाती पर,
आसमान में चमकते
सूरज के ठीक नीचे,
खो जाती हैं दिशाएं,
अपनी सार्थकता खोकर।
आखिर शून्य के प्रसार की इस
अनंत निस्सीमता
जिसका न ओर
न छोर।
★★★★★
आदरणीय विकास नैनवाल जी
कैद था जज़्बातों के पिंजरे में अब तलक,
तोड़कर पिंजरा, अब पंख फैलाना सीख लिया है,
कभी करा करता था ऐतबार आँख मूंद कर,
मुखोटा चेहरे से मैंने हटाना सीख लिया है
★★★★
आदरणीय अभिषेक ठाकुर
वजूद तक नहीं रहता, फासला जहां नहीं रहता
यूं तो वो क़ायनात के ज़र्रे-ज़र्रे में मौजूद है
जिस भी गली मैं देखूँ, केवल वहाँ नहीं रहता
मुद्दतें गुज़रीं, अब किससे मिलने आए हो
वो शख्स कोई और था, अब यहाँ नहीं रहता
जिस भी गली मैं देखूँ, केवल वहाँ नहीं रहता
मुद्दतें गुज़रीं, अब किससे मिलने आए हो
वो शख्स कोई और था, अब यहाँ नहीं रहता
★★★★★
आदरणीया रश्मि जी
फिर से उसे प्यार करना है
ज़िंदगी में ग़म
शुमार करना है
एक बार फिर से
उसे प्यार करना है
वक़्त के ख़ाली लिफ़ाफ़े से
अब जी नहीं बहलता
फूलों की गमक से
अपनी शाम भरना है
आदरणीया रश्मि जी
फिर से उसे प्यार करना है
ज़िंदगी में ग़म
शुमार करना है
एक बार फिर से
उसे प्यार करना है
वक़्त के ख़ाली लिफ़ाफ़े से
अब जी नहीं बहलता
फूलों की गमक से
अपनी शाम भरना है
"जानती हूँ! आपको कभी पसंद नहीं था कि साकेत और मोहनी एक कम्पनी में काम करे.. जब साकेत
एक बड़ी कम्पनी में काम करता था और उस
कम्पनी ने मोहनी को रखना चाहा था तो आपने
विरोध किया था... समय का पहिया
बहुत तेज़ी से बदला...
एक बड़ी कम्पनी में काम करता था और उस
कम्पनी ने मोहनी को रखना चाहा था तो आपने
विरोध किया था... समय का पहिया
बहुत तेज़ी से बदला...
यह शायद अजीब बात है, लेकिन मन शांत है पूरी तरह अब | मुझे अपने दोस्तों पर प्यार उमड़ रहा है| मुझे लोगों से मुहब्बत हो रही है | मुझे अपने मुल्क से इश्क़ हो रहा है | फिर से...फिर-फिर से !
यह विदाई थी या स्वागत था ?
कहो ना दोस्त, यह समापन था की थी शुरुआत ?
★★★★★
आदरणीया नुपूर जी का काव्य पाठ का आनंद लीजिए
अपने बड़ों के हाथों का बुना स्वेटर
आदरणीया नुपूर जी का काव्य पाठ का आनंद लीजिए
अपने बड़ों के हाथों का बुना स्वेटर
★★★★★
आज का अंक कैसा लगा?
कृपया अपने बहुमूल्य सुझाव
अवश्य प्रेषित करें।
हमक़दम के अंक के लिए
कल का अंक पढ़ना न भूलेंं
कल आ रही है विभा दी अपनी विशेष प्रस्तुति के साथ।
★
नित नये नाटक के बनते, हम मोहरे आसान
देकर झुनझुना बहलाइये, हम वोटर भगवान
नवयुग निर्माण के लिए,बकरों की है माँग
बाड़ों में भगदड़ मची,आफ़त में अपनी जान






