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रविवार, 23 दिसंबर 2018

1255..बेशर्मी की हद होती है, जनता जिनको सपने देती है

शुभ रविवार..
आज मन बहुत दुखी है
हमारा प्यारा दिसम्बर जो जा रहा है
सच में..बड़ा ही प्यारा है
छोटे-दिन..लम्बी रातें
भूली-बिसरी बातों से भी
कटती नहीं ये प्यारी रातें

नहीं न लिखेंगे अब आगे...
चलिए रचनाएं की ओर चलें....

मैंने खुला छोड़ रखा है 
अपने घर का दरवाज़ा,
इस उम्मीद में 
कि शायद भूला-भटका 
कोई दोस्त आ जाय 
या कोई अति उत्साही 
दुश्मन ही घुस आय.

छोटी बड़ी बातों पर
देना   बधाइयां 
हो गई एक प्रथा 
आज कल 
बधाइ  चारो ओर से  
लिपट जातीं   उनसे

धूमिल सी हो चली थी संध्या,
थम गई थी, पागल झंझा,
शिथिल हो, झरने लगे थे रज कण,
शांत हो चले थे चंचल बादल....

इस दृष्टि-पथ से, तुम हुए थे जब ओझल...

गजल सीखने के लिए जरूरी है कि आपको 
१-मात्रा ज्ञान हो।
२-रुक्न (अरकान) की जानकारी हो।
३-बहरों का ज्ञान हो।
४-काफ़िया का ज्ञान हो।
५-रदीफ का ज्ञान हो।
और फिर शेर और उसका मफ़हूम (कथन)।
एवं गजल की जबान की समझ हो।


अशोक बाबु माहौर
वो यूँ ही 
एक मुस्कान 
छोड़ चली गई 
हाथ हथेली पर रख 
किधर गई, 
मैं ठगा सा 
देखता रहा तन्हा 
वो यादें 
बेबुनियाद दे गई |


चलते-चलते एक और मेरी ओर से
करोड़पति हैं 
पढ़े लिखे हैं
अखबारों में 
मत छपवाओ

चुल्लू भर 
पानी दे आओ

सफेद 
कपड़ों पर 
मत जाओ
दल से इनके 
मत भरमाओ

भाईचारा 
समझ भी जाओ
-*-*-*-
अच्छा तो अब चलते हैं
फिर मिलेंगे
यशोदा







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