निवेदन।


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बुधवार, 14 नवंबर 2018

1216...लिखा हुआ रंगीन भी होता है रंगहीन भी होता है

सादर अभिवादन
आदरणीय सखी पम्मी जी
एक पुण्य कार्य कर रही है
उन्होंनें माता षष्ठी का त्रिदिवसीय व्रत रखा है
माँ षष्ठी उन्हें सफल करे
चलिए चलें आज 
हमारी पसंदीदी रचनाओं पर एक नजर...



भोर चार बजे नींद खुली तो दूर किसी लाउडस्पीकर पर बजते पवित्र पावन सुमधुर शारदा सिन्हा के  गीतों ने के आकर्षक में बंधी हुई बालकनी का दरवाज़ा खोलकर खड़ी हो गयी ताकि और अच्छे से गाने के बोल सुन सकूँ।  ठंड काफी बढ़ गयी है भोर में वैसे भी थोड़ा ज्यादा ही सिहरन होती है गीत समाप्त होते ही एहसास हुआ। पर फिर भी मन नहीं हुआ भीतर आने का वही कोने में चेयर खींचकर बैठ गयी। दूर टिमटिमाती रंगीन बल्ब की झालरों और छठ के गीतों का मिश्रण मुझे अतीत में खींच कर ले गये।

शब्दों, के ये रंग गहरे!
लेखनी से उतार, किसने पन्नों पे बिखेरे......

विचलित, कर सके ना इन्हें,
स्याह रंग के ये पहरे,
रंगों में डूबकर, ये आए हैं पन्नों पे उभर,
मोतियों से ये, अब हैं उभरे...


गर है मन में मिलन आस,तो भरोसा रखो तुम ,
बस अपनी,मेरी इन धड़कनों को सुनो तुम ,
न करो बातें यूँ,उदास और बोझिल सी,
इस बेमानी सी दुनिया,नियमों की , 
ये सांझ रुपहली,चाँद चोर है, 
ऐसी ही कोई बात करो।


My photo
बरसने दो नेह को,
आँखों के बादलों से तुम !
हूँ अभी ज़िंदा, मुझे
होता रहे आभास यूँ ही !
तुम रहो ना, पास यूँ ही।।

एक शोर से गुजरी हूँ, दूसरे शोर में दाखिल हुई हूँ. तीसरा शोर इंतज़ार में है. फिर शायद चौथा, पांचवां या सौवां शोर. चल रही हूँ चलने का सबब नहीं जानती शायद इतना ही जानती हूँ कि न चलना फितरत ही नहीं. चलना कई बार शोर से भागना भी होता है यह जानते हुए भी कि यह शोर अंतहीन है. भीतर जब शोर हो तो बाहर तो इसे होना ही हुआ. मुझे शोर से मुक्ति चाहिए, खूब बोलते हुए घनी चुप में छुप जाने का जी चाहता है. शांति चाहती हूँ लेकिन जैसे ही शांति के करीब पहुँचती हूँ घबरा जाती हूँ. क्या चाहती हूँ पता नहीं,

सोचते थे हम सुरक्षित जिन सरोकारों के दर 
छत दीवारों से अटी थी दीमकें थीं भीत पर  

 फ़ैसले में जब मिला संवेदनाओं को जहर 
चुप रहे सब पेन की टूटी हुई निब देख कर 

रंगहीन 
लिखते 
चले जाने से 

रंगों को 
मुँह फेर ही 
लेना होता है 

वर्णान्ध होना

रोग भी होता है 

रंगों से 
बेरुखी हो 
तो हो लेना भी 
बुरा नहीं होता है । 
................

पैंतालिसवें विषय का विवरण
यहाँ है
..............

आज्ञा दें
नदी पर जाकर मिलना-जुलना है
यशोदा














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