।।प्रात: वंदन।।
बताओं तो सही अच्छा क्या हो
घर- घर आबोदाना हो
गुलों की आबोहवा मंलग हो
मोसम-ए-बहार हो या
वो घने बादलों में भीगने की जिद्द हो...
आप सभी के समक्ष इसी सवाल के साथ आज की कड़ी में..✍
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पावस ऋतु का स्वागत करती आदरणीय विश्वमोहन जी की रचना..
कानन में बदरी करियाई
दरिया उड़ेला
अकुलाये आसमान ने
नदी का पेट
लताओं को सहलाता
लतायें इठलायी शरमायी
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पा उसका स्पर्श
धरती सकुची शरमाई
हरियाली की चूनर ओढ़े
फिर मंद मंद मुस्काई
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तुम नेता नहीं देवता जो कहलाते
अपने देश में यदि राजनैतिक जुमले की बात करें, तो उसके केंद्र में गरीबी ही रही है, जातीय - मजहब और मंडल कमंडल की सियासत से पहले भी एवं बाद में भी । "गरीबी हटाओ देश बचाओ " का नारा 1971 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी का और " अच्छे दिन आने वाले हैं " यह जुमला 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी का रहा है। पर हम निम्न मध्यवर्गीय लोगों के जीवन स्तर में इतने वर्षों में क्या तनिक भी सुधार हुआ है ? ईमानदारी से सत्ताधारी दल के नये-पुराने नेता बस इतना बता दें!..
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कार्टून:-राग बरखा
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कार्टून:-राग बरखा
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ब्लॉग सच की बात, विक्रम के साथ
एक परिंदे की परवाज़ एक बिल्डिंग कीखिड़की से धूल भरी फ़िज़ा मे शुरूहोती है और दूसरी बिल्डिंग की ऊँचाईनापते-नापते टकराकर दम तोड़ देती है।परिंदे के घोंसले बन्द आपार्टमेंट केवाशरूम की खिड़कियों के मोहताजहोते है। जिस रोज़ exhaust लगा।घोसला उजड़ जाता है।
दिन चढ़ता है नई भोर है
तीव्र चपल कुछ नया शोर है !
उषा की लाली तप्त है
पवन चल रहा जरा सख्त है !
चारों ओर भरी नीरवता
बिखरी है हर ओर व्यवस्था
तूफां जब आने को होता
हो जाती है यही अवस्था !
प्रकृति के अद्भुत सामंजस्य को समेटती डॉ इंदिरा जी की रचना.. के साथ यहीं तक..
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह..✍




