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सोमवार, 17 जनवरी 2022

3276 ...... प्रेम के रंग और बेचारे बदरंगे बैगन

 हाज़िर हूँ पाक्षिक हलचल ले कर । यूँ हलचल तो पाक्षिक नहीं है क्योंकि आपको प्रतिदिन पांच लिंकों के  आनन्द पर नए लिंक्स मिलते हैं । बस मैं ही यहाँ पाक्षिक रूप से उपस्थित हो पाती हूँ । 

आप सबका असीम प्यार मिलता है तो ये मंच छोड़ भी नहीं पा रही । वैसे यूँ ही सोच रही थी कि प्यार के कितने पर्यायवाची शब्द हैं ? जैसे प्रेम , मुहब्बत , इश्क , नेह, स्नेह, चाहना अभी इतने ही याद आये बाकी आप सोचियेगा । वैसे भी कवि /  कवयित्री / शायर  सभी  प्रेम में डूब कर ही तो कुछ लिख पाते हैं । हमारे चारों ओर प्रेम के रंग बिखरे पड़े हैं किसको कौन सा रंग भाता है ये हर व्यक्ति के लिए अलग है .......

आपको कुछ रंग दिखाने का प्रयास मैं भी करती हूँ ....... 

एक नारी अपने ख्वाबों में , खयालों में क्या सोचती है ? जानिए इस रचना में ----

प्रेम के रंग 

मन के समुंदर पर नमक की स्याही से
प्रेम लिखकर बंदकर शीशियों में 
भावनाओं की लहरों के बीच
छोड़ देती अक्सर वह स्वतंत्र,
बंधहीन बहने के लिए।


कितना कुछ सोच लेती है एक नारी  कि उसके लिए उसको प्रेम करने वाला ऐसा होगा क्या ? और जब हकीकत के धरातल पर कदम पड़ते हैं तो सब बिखर सा  जाता है । उस समय खुद को संभालना होता है , गर नहीं समेटते तो सब बिखर जाता है ।खुद को समेटने का गुर जानना है तो पढ़िए ये रचना --

स्नेह शिशु ....

स्नेह-शिशु कभी निश्छल कौतुकों से ठिठक कर, इस भर्राये कंठ में जमे सारे अवसाद को पिघलाने के लिए, प्रायोजित उपक्रम कर रहा है। तो कभी वह ओठों के स्वरहीन गति को, निर्बंध गीतों में तोतलाना सिखा रहा है। वह येन-केन-प्रकारेण हृदय को, अपने अनुरागी स्नेह-बूँदों की आर्द्रता देकर, नव रोमांच से अभिसिंचित करना चाह रहा है

इस लेख को पढ़ कर कुछ तो मनोबल ज़रूर बढ़ा होगा । हम सब जानते हैं  कि जीवन में जहाँ इतने अवसाद हैं , उनसे उबरने के लिए बहुत कुछ साधन भी हैं .... साहित्य क्षेत्र में माने तो हास्य और व्यंग्य की विधा में किया गया लेखन  मन के उदास भाव को बदल भी देता है .... तो माहौल को बदलते हुए एक व्यंग्य पढ़िए ...

बेचारे बदरंगे बैंगन 

यूं तो जब से कड़ाके की ठंड पड़नी शुरू हुई तब से रजाई और कंबल से कुछ अधिक ही प्रेम बढ़ गया है। घड़ी का निठल्ला कांटा जिसे समय दिखाने के अलावा और कुछ काम ही नहीं है, जब सुबह के सात पर जा पहुंचता है तो झक मार कर रजाई से विदा लेनी पड़ती है। रजाई भी इस बात से व्याकुल हो उठती है कि उसे अब दिन भर मेरा विरह सहना पड़ेगा। 

अब चुनाव का मौसम है ..... वैसे ये मौसम पूरे  सालभर  चलता है ...बस जगह बदल जाती है ...लेकिन ये उत्तर प्रदेश के चुनाव की बात है तो सबकी नज़र इस पर है .इसीलिए ये व्यंग्य बहुत समसामयिक है |  इसी रंग में रंगी एक और रचना  ....

प्यारे राजनीति में आएँ


वो भूखा है, रहने दो,
बिन कपड़े के जीने दो ।
उसका बोझ उसी के द्वारा, 
सिर पर उसको ढोने दो ।।
किसे जरूरत है कि उसके
वोट की कीमत उसे बताएँ ।
प्यारे राजनीति में आएँ ।।

चलिए नेताओं पर तो हो गयी थोड़ी  छींटाकशी की  बौछार और अब बात उनके लिए जो ग़ज़लों को करते हैं प्यार ..... जी हाँ कुछ लोगों को ग़ज़लों से भी प्यार होता है खाली प्यार में ही ग़ज़ल नहीं कहते ..... 

गजल में  दीन- दुनिया की  बात करने में माहिर  जो हैं उनकी ग़ज़ल पेश है ....

परवाज़ परिंदों की अभी बद-हवास है ...


तबका न कोई चैनो-अमन से है रह रहा,
सुनते हैं मगर देश में अपने विकास है.
 
ज़ख्मी है बदन साँस भी मद्धम सी चल रही,
टूटेगा मेरा होंसला उनको क़यास है.


अब बताइए देश में रहने वाले लोग चैन से नहीं रह सकते , जब कि इस अमन चैन के लिए हमारे वीर सैनिक अपनी जान न्योछावर कर देते हैं ..... ऐसे शहीद के  परिवार  पर क्या बीतती है ?  बस आज कल फेसबुक पर एक दिन नमन छाया रहता है ... क्या उससे  उनका कुछ भला हो सकता है ?  ऐसे ही कुछ विचार पढ़िए आप इस रचना में ....


छिन गया बचपन बच्चों का,
उठ गया सर से जब साया,
हो गये अनाथ जो इक पल में
छिन गया पिता का इन्हे सहारा.....
मुश्किल जीवन बीहड राहें,
उस पर मासूम अकेले से,
कैसे आगे बढ़ पायेंगे,
सोच के मन मेरा घबराया.....

ये तो है एक सैनिक जो शहीद हो गया उसके परिवार की कहानी , लेकिन एक सैनिक के मन में क्या जज्बा होता है उसे बहुत सुन्दर शब्दों में इस रचना में वर्णित किया गया है ...

मैं सैनिक


निर्भय हूँ  और राष्ट्र को
आश्वासन देता  निर्भय  का ,
मृत्यु -पथ का राही मैं
चिर अभिलाषी  अमर विजय का!

यूँ  सैनिक  दिवस के  उपलक्ष पर हमारे अनेक लेखक साथियों ने बहुत सुन्दर रचनाएँ लिखीं . पढ़ कर मन में वीर रस का भाव जाग गया ....उन सभी को मेरा साधुवाद .... 

हमने शुरुआत की थी प्रेम के रंग से ..... वैसे आपको नहीं लगता कि प्रेम के कभी कभी ऐसे रंग देखने को मिलते हैं जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर पाता ...., लेकिन कवि मन कब कहाँ सौन्दर्य देख ले आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते .... एक बानगी देखिये ....


उन 
औरतों की
उकेरी गयी,
किसी कुशल
शिल्पी की
'मॉडर्न आर्ट'-सी,
पाँचों ही
उँगलियों की
गहरी छाप-से ..

अभी इस रचना में दी गयी उपमा से उबर भी न पाए कि एक और सुन्दर रचना नज़र आ गयी ..... छोटी सी है ,  थोड़ा विरह का रंग है  लेकिन शब्द विन्यास और अलंकारों से सुसज्जित है .... बस अब आप पढ़ ही लीजिये .... 



अमावस में रजनीश का वनवास,
नील,नीरव, निरभ्र अकेला  आकाश.

ऊपर हम बात कर रहे थे अवसाद कि तो अवसाद में हम और आप ही नहीं आते ...कभी कभी निर्जीव चीजें भी उदास हो जाती हैं .... उनको भी हमें झाडना पोंछना  चाहिए ....  ऐसे ही देखिये और मनन कीजिये कि इनके अवसाद को हम कैसे दूर करें ..... 


पुस्तकें अवसाद में अब

बात कल की सोचती सी

झाड़ मिट्टी धूल अंदर

हम रहें मन रोसती सी।।

तो एक गुजारिश कि केवल इंटरनेट  पर पढने लिखने का काम न करें ...कभी कभी किताबें भी पढ़ें और डायरी  में भी लिखें ..वरना अगली बार  डायरियाँ अवसाद में आ जाएँगी .... वैसे कभी कभी इस अवसाद को लोग ओढ़ और बिछा लेते हैं ... उदास होने का बस बहाना चाहिए .... वैसे बहाना नहीं कहना चाहिए , लेकिन इतना दर्द भी भला क्यों ? ... चलिए पढ़ते हैं एक ग़ज़ल ....



दर्द-ए-दिल पर किसकी हैं परछाइयाँ,
साथ जिनके इतनी हैं गहराइयाँ ।

ज़िन्दगी का यूँ सफ़ऱ मुश्किल हुआ,
इतनी रंजिश, इतनी हैं रुसवाईयाँ।

 बस मेरा तो  इतना ही कहना   है कि  ---

ज़िन्दगी को यूँ मुश्किल हमारी सोच ने है कर दिया 
किसकी ज़िन्दगी में नहीं है  आज - कल  परेशानियाँ | 

और इसी के साथ आज बस इतना ही ........ फिर मिलते हैं कुछ नयी  पुरानी  रचनाओं के साथ ....... तब तक के लिए ..... खुश रहिये स्वस्थ रहिये ....  स्वयं को कोरना कहर से बचा कर रखिये .... मास्क ज़रूर लगायें ..... , जो लोग पहले कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं  वो  भी बहुतायत से  संक्रमित हो रहे हैं ...
याद रखिये .... सावधानी हटी दुर्घटना घटी ......

नमस्कार ....

संगीता स्वरुप .

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