सादर अभिवादन
लोग शायद समझ नहीं पाए
समर का तात्पर्य
कोई रचना नहीं दिखी
और न ही आई
खुदाई पर मिली रचनाएँ
खुदाई मे सहयोगी सखी श्वेता सिन्हा
पढ़िए...अतीत की रचनाएँ
शुरुआत कालजयी रचना से
लोग शायद समझ नहीं पाए
समर का तात्पर्य
कोई रचना नहीं दिखी
और न ही आई
खुदाई पर मिली रचनाएँ
खुदाई मे सहयोगी सखी श्वेता सिन्हा
पढ़िए...अतीत की रचनाएँ
शुरुआत कालजयी रचना से
कवि श्रेष्ठ रामधारी सिंह "दिनकर"
समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे
समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर
आदरणीय वीरेन्द्र डंगवाल
है हवा कठिन, हड्डी-हड्डी को ठिठुराती
आकाश उगलता अंधकार फिर एक बार
संशय विदीर्ण आत्मा राम की अकुलाती
होगा वह समर, अभी होगा कुछ और बार
तब कहीं मेघ ये छिन्न-भिन्न हो पाएँगे
तहखानों से निकले मोटे-मोटे चूहे
जो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहे
हैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरें
चीं-चीं, चिक-चिक की धूम मचाते घूम रहे
..
उपरोक्त दोनों रचनाएं
..
उपरोक्त दोनों रचनाएं
युद्ध के परिप्रेक्ष्य में लिखी गई है
.....
नियमित रचनाओें की श्रृंखला अभी रीती सी है
.....
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नियमित रचनाओें की श्रृंखला अभी रीती सी है
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आदरणीय साधना वैद

इस महासमर में प्रभु की इतनी
प्रबल और शक्तिशाली सेना के सामने
आम इंसान की यह निर्बल असहाय सेना
कहीं नहीं ठहर सकती लेकिन इस
आम इंसान में हिम्मत और हौसला बहुत है,
इसकी जिजीविषा ज़बरदस्त है !
जो ये एक बार ठान ले तो
हर आपदा को परे ढकेल

आदरणीय सैलाना
आदरणीय आशा लता सक्ससेना
समर क्षेत्र

आदरणीय सुबोध सिन्हा
आदरणीय विश्वमोहन जी
आज विधना ने अचानक कौन सा है चित्र उकेरा?
जीवन-रण में काल खड्ग से टकरा गया तलवार तेरा.
समर के इस विरल पल मे गुंजे अट्टाहास तेरा,
कालजयी, पराक्रमी-परंतप, अरि-दल बने ग्रास तेरा.
टूटना पर झुक न जाना, तू याद कर मेरा सखा है.
छोड़, मेरे आंसूओं में क्या रखा है!
आदरणाय मीना शर्मा जी
गलीचे मखमली,कलियाँ,
नर्म फूलों की पंखुड़ियाँ,
नहीं कदमों तले हों, तो
सफर तजना है कायरता।।
यही तो कर्मभूमि है....
नर्म फूलों की पंखुड़ियाँ,
नहीं कदमों तले हों, तो
सफर तजना है कायरता।।
यही तो कर्मभूमि है....
आदरणीय पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा

जीवन एक समर है, हर संकट से तू लड़ता चल,
आत्मबल से हर क्षण को विजित करता चल।
जीवन एक प्यार है, दिलों से नफरत को तू तजता चल,
कर हिय को झंकृत द्वेश घृणा पर विजय पाता चल।
आदरणीय ऋता मधु शेखर
होती है खामोश जब, चूड़ी की झनकार
विधवा सूनी माथ पर, लिखती है ललकार
सिर से साया उठ गया, छूट गया है साथ
आज सलामी दे रहे, नन्हे नन्हे हाथ
विधवा सूनी माथ पर, लिखती है ललकार
सिर से साया उठ गया, छूट गया है साथ
आज सलामी दे रहे, नन्हे नन्हे हाथ
आदरणीय आँचल पाण्डेय
है लाक्षागृह में लपट उठी,
फिर शकुनि की बिसात बिछी,
पक्षों में दोनों अधर्म खड़ा,
विदुरों का धर्म वनवास गया।
शांति का ना कोई दूत यहाँ,
कुरुक्षेत्र हुआ अंधकूप यहाँ।
क्या राष्ट्रप्रेम का शोर है?
ये क्षण का बस ढोंग है।
आदरणीय अभिषेक सिंह 'नीलांश'
जाने किस आवाज से वो हो जाएगा ख़ामोश ,
जाने किस एहसास से वो नामाबर हो जाये
आपको मालूम है हर पल है खुद से जंग ,
फिर भी तसल्ली को खुद में समर हो जाये
उजड़े ना खेत- खलिहान।
जहाँ न रहेगी कोई बथान।
खेतों में फैकट्रियाँ लगेंगी।
नकली अनाज जहाँ बनेगें।
ऐसे जन पर कहर न करना।।
गाँव मेरे तू शहर न बनना।।
जहाँ न रहेगी कोई बथान।
खेतों में फैकट्रियाँ लगेंगी।
नकली अनाज जहाँ बनेगें।
ऐसे जन पर कहर न करना।।
गाँव मेरे तू शहर न बनना।।
आदरणीय रूपचंद्र शास्त्री मयंक
लगा झटका-बढ़ा खटका, खनककर आइना चटका
बग़ावत कर रहीं अब पगड़ियाँ, दस्तारखानों की
सियासत के समर में मिट गया, अभिमान दल-बल का
अखाड़े में धुलाई हो गयी, जब पहलवानों की
आदरणीय प्रीति सुराना
यानि यादों की किताब को थामें
जो तुम्हारी अनुपस्थिति में
एक मात्र सहारा है
मेरे सुख-दुख का,
यादों के भंवर से डूबती उतरती
बचती, संभलती,..
तुम्हारे बिना सब कुछ संभाल लेने हेतु कर्तव्यबद्ध हूँ,
अश्रु को तुम्हारे लक्ष्य हेतु
बाधक न होने देने को वचनबद्ध भी,
हर वचन निभाऊंगी,..
जो तुम्हारी अनुपस्थिति में
एक मात्र सहारा है
मेरे सुख-दुख का,
यादों के भंवर से डूबती उतरती
बचती, संभलती,..
तुम्हारे बिना सब कुछ संभाल लेने हेतु कर्तव्यबद्ध हूँ,
अश्रु को तुम्हारे लक्ष्य हेतु
बाधक न होने देने को वचनबद्ध भी,
हर वचन निभाऊंगी,..
आदरणीय राजेंद्र शर्मा
क्रांति से भ्रांति मिटे है निकले घर से नाग है
माटी पर जो मर मिटा है,मिट्टी से अनुराग है
क्रांति से मिटती है खाई,क्रांति ने गरिमा लौटाई
क्रांति के आव्हान से ही, होते हम आजाद है
आदरणीय सैलाना
सफ़र की क़ीमत थकन से न आँको
न छालों का, काँटों का
न पसीने की बूँदों का
किसी भी बैंक में लॉकर नहीं होता
क्यूँ करते हो रश्क देखकर
इमारतें बुलन्द किसी की
यूँही नहीं होती हासिल मंज़िले
हौसला दिल में 'गर नहीं होता
आदरणीय भारती दास
द्रवित हो गई सरल सुनैना
भर आये थे उसके नैना
उसने कहा घर मेरे आना
काम काज में हाथ बंटाना.
कर्मठ कर्म करते रहते हैं
भर आये थे उसके नैना
उसने कहा घर मेरे आना
काम काज में हाथ बंटाना.
कर्मठ कर्म करते रहते हैं
आदरणीय आशा लता सक्ससेना
समर क्षेत्र

वादा किया है खुद से |
कायर पीठ दिखाकर
पीछे हट जाते हैं
पर हम पूरे जोश से
खड़े हैं समर भूमि में |
ईश्वर पर अटूट है श्रद्धा
समर में पीठ दिखा कर
भागेंगे नहीं कायर की तरह
यही वादा किया है खुद से |
सोचता हूँ कभी-कभी कि ..
लगभग हजार साल पहले
महमूद गजनवी के सोलहवें
आक्रमण के समय 1025 ईस्वी में
कोई ना कोई तो हमारा भी
एक अदना-सा पूर्वज रहा होगा ?
पर भला कौन रहा होगा ?
जिसके डी एन ए का अंश आज हमारा होगा
मुझे तो पता ही नहीं .. तनिक भी नहीं।
...
आज बस इतना ही
कल का अँक देखना न भूलें
123 वाँ विषय लेकर आ रहे हैं
भाई रवीन्द्र जी
सादर
लगभग हजार साल पहले
महमूद गजनवी के सोलहवें
आक्रमण के समय 1025 ईस्वी में
कोई ना कोई तो हमारा भी
एक अदना-सा पूर्वज रहा होगा ?
पर भला कौन रहा होगा ?
जिसके डी एन ए का अंश आज हमारा होगा
मुझे तो पता ही नहीं .. तनिक भी नहीं।
...
आज बस इतना ही
कल का अँक देखना न भूलें
123 वाँ विषय लेकर आ रहे हैं
भाई रवीन्द्र जी
सादर











