सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
कल ही तो शुरुआत हुई है
2015 को विदा करने की तैयारी
और
2016 को स्वागत करने के लिए
तैयार हो रहने की होशियारी
आगत विगत स्वागत
बन जायें तथागत
काश सम्भव होता
काश में न अटक आगे बढ़ते हैं
और
अपनी सोच से अवगत कराते हुये
आज एक ब्लॉग के
कुछ लिंक से
परिचय कराते हैं
तू मेरी प्रतिछाया है
सबसे बड़ा आभास है
मेरे हर जीत का कारण
और हर हार में
बढ़ाता विश्वास है।
तो आप किसी एक गुट के नहीं हैं?
वैसे हमारी पत्रिका भी किसी गुट, किसी ग्रुप को महत्त्व नहीं देती।
हम जितने हैं, एक टीम की तरह काम करते हैं।
वैसे अच्छा लगा कि आप
दूसरे गुट की पत्रिका की भी तारीफ करते हैं।
बदलाव की इस उत्सव से भारत के रंग और चटक होते गए।
इसके हर विकास में सबका योगदान रहा।
भारत की समन्वयात्मक संस्कृति में पंडितों का योगदान रहा।
साधु-संन्यासियों का योगदान रहा।
ख्वाजाओं ने भी इस संस्कृति को सँवारा।
लड़कों के हाफ-पैंट से भी छोटा उसका कैज़ुअल-ड्रेस है।
कॉलेज से निकलते ही शाम तक दोस्तों के साथ पार्क-मॉल
और न जाने कहाँ-कहाँ घूमना, कभी-कभी बिअर का
एक-दो पैग ले लेना तो अब उसकी जीवन-शैली हो गई है।
अब वह नंदी के नाम से पुकारी जाती है।
अगर सोचते हो
लक्ष्य को पाना है
तो हर हाल में
आगे
और आगे
और आगे
बढ़ते जाना है।
देखो जला रही जग को है,
संघर्षों की अद्भुत ज्वाला।
प्रतिपल कँपा रहा सबको है?
भीमकाय बन संशय काला।
ज्वालाओं को सुधा-सिक्त कर
नव-गति, नव-लय, ताल-छनद नव,
नवल-कंठ, नव जलद-मंद्र-रव,
नव-नभ के नव-विहग-वृंद को
नव पर नव स्वर दे।
नवीनता चाहे किसी भी अवसर का हो,
मन में उल्लास भरने वाले उस नव पल के लिए
मेरा मन भी असीम शुभकामना व्यक्त कर रहा
फिर मिलेंगे ....... तब तक के लिए
आखरी सलाम
विभा रानी श्रीवास्तव
