आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
तोड़ दिए इस शोर ने,
सभ्यता का सुंदर वस्त्र
चीर दिया इस दौर ने।
गाली जब बनी 'कूल' होने का पैमाना,
तब भाषा ने धीरे से दम तोड़ दिया।
हमने अपनी ही संस्कृति का चेतना-पुंज,
अपने ही हाथों से फोड़ दिया।
थोड़ी देर स्वयं के संग भी, बैठ सकूँ तो बात बने,
मन के सूने आँगन में फिर, कोई चुप-सी भोर तने।
साँस-साँस जग को सौंप दी, अपने लिए जिया नहीं,
भीतर बैठा जो मैं था, उससे कभी मिला नहीं
दिल की गहराई में
जीवन का इक अंश छिपा है,
श्रम के कटु प्रयत्न से मिलता
स्नेहिल मृदु आँच में पका है !
दिल की गहराई में दीपक
बिन बाती बिन तेल जल रहा,
श्वासों में अहर्निशा जैसे
सहज मंत्र अनवरत चल रहा !
अभी जो कुछ पिछले दिनों दिल्ली में हुआ जहां बेकाबू-निरंकुश-पाशविक भीड़ ने दरिंदगी की हद पार कर दी, जहां महिला पुलिस कर्मियों तक को नहीं बक्शा गया ! जहां सुरक्षाकर्मियों की जान पर बन आई ! जहां धक्का-मुक्की, हाथा-पाई, गाली-गलौच, बेइज्जती की सारी सीमाएं लांघ दी गईं ! वहीं माहौल को संभालने में जिस धैर्य, जिस संयम, जिस परिपक्वता का उदाहरण दिल्ली की पुलिस ने दिया वह दुनिया में शायद ही कहीं देखने को मिले !





मर्यादा के सारे तटबंध
जवाब देंहटाएंतोड़ दिए इस शोर ने,
बेहतरीन अंक
आभार
वंदन
सूर्य का पर्याय दीपक जब बुझने लगता है तब बहुत तेज रौशनी करता है- उस उदाहरण से मुझे निजी तौर पर लगता है कि किसी चीज का अन्त पराकाष्ठा पर होने से लगता है-
जवाब देंहटाएंसमाज में व्याप्त गाली पर अक्सर उँगलिया उठाई जाती रही लेकिन गाली देने वालों की कभी कमी नहीं हुई -अब शायद हो जाए-
सुप्रभात! बहुत कुछ सोचने पर विवश करने वाली रचनाओं से सजा अंक, 'मन पाये विश्राम जहाँ' को शामिल करने के लिए बहुत बहुत आभार श्वेता जी !
जवाब देंहटाएंबेहतरीन अंक !
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