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शुक्रवार, 26 जून 2026

4785...जिनकी नहीं क़लम से कभी दोस्ती हुई

 शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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जब भी समाज में कोई अविश्वसनीय हिंसक और क्रूरतम घटनाएं होती हैं—खासकर जब उसमें कोई युवा या लड़की/लड़का शामिल हो—तो यह पूरे समाज को भीतर तक झकझोर कर रख देती है। जब कोई इतनी कम उम्र में ऐसा कदम उठाता है, तो यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि आखिर इतनी कम उम्र में इतनी नफरत या संवेदनहीनता कैसे आ सकती है? 
यह सवाल खड़ा होता है कि हमारी न्याय प्रणाली, परवरिश या मानसिक स्वास्थ्य के स्तर पर कहां कमी रह गई कि कोई इस हद तक चला गया। कुछ लोग अपने जीवन में इस हद तक आत्मकेंद्रित (Self-centered) हो जाते हैं कि उन्हें दूसरों का दर्द, यहाँ तक कि दूसरों का जीवन भी अपने स्वार्थ के आगे बहुत छोटा लगने लगता है। यह एक गंभीर मानसिक और नैतिक पतन है।
मैं मानवीय मूल्यों के पतन से आहत हूॅं खासकर एक स्त्री जो ममता ,दया, त्याग,सृजन और प्रेम का स्वरूप मानी जाती है और उसके द्वारा ऐसे हत्याकांड किया जाए तो बहुत शर्म आती है मुझे एक स्त्री होने के नाते।

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आज की रचनाऍं-


जिसकी नहीं कलम से कभी दोस्ती हुई,
कहते हैं वो भी एक उपन्यासकार है.

क़ानून सिर्फ़ एक है क़ानून कुछ नहीं,
जंगल का फिर भी हाल मगर शानदार है.

पैसा अगर हो पास तो जितनी बुराई हो,
बच्चा रईस बाप का भी होनहार है.


एक और गंभीर प्रश्न है

जब शिक्षा स्वयं
'सीमित अनुमति' में बदल चुकी हो,
तो इतनी डिग्रियाँ
आख़िर आई कहाँ से?
किस अदृश्य बाज़ार से?
और किस स्वीकृत वास्तविकता में
उन्हें प्रमाणित किया गया?



नियम को तोड़ना ही शान समझें जब।
सुरक्षा का उन्हें कब अर्थ आएगा।।

सरल है दोष दूजे पर लगा देना।
स्वयं के खोट मानव कब गिनाएगा।।




एक दिन गांव में बहुत तेज आंधी आई। लोगों ने देखा कि बुजुर्ग का दीपक तेज आंधी में भी जल रहा है। युवक फिर बुजुर्ग के पास गया और पूछा, बाबा! आपका दीपक कैसे जल रहा है? बुजुर्ग ने कहा कि मैंने अपने दोनों हाथों से दीपक को बुझने से बचाया था।  युवक ने कहा कि बाबा, इस एक दीपक से पूरी दुनिया का अंधेरा दूर नहीं हो सकता। 



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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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1 टिप्पणी:

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