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रविवार, 21 जून 2026

4780...समय मनुष्य को खर्च करता रहता है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से।

सादर अभिवादन। 

आज पितृ-दिवस(Father's Day) पर अपने पिताश्री का स्मरण करते हुए भूमिका में अपनी एक रचना  'पिता की स्मृति' प्रस्तुत कर रहा हूँ-

6 फरवरी 2008 से 

अब तक 

एक अधूरापन 

मेरे भीतर 

घर कर गया है 

करते होंगे लोग 

बरसी पर स्मरण पिता को

मेरी स्मृति से 

वह पल जाता ही नहीं 

जब मुखाग्नि दी थी 

बड़े भैया ने चिता को

एक काया 

अपना सफ़र 

मुकम्मल कर रही थी   

देखते-देखते 

पिता जी की पार्थिव-देह 

पंचतत्त्व में विलीन हो गई थी

उन्हें लेकर गए थे 

सजी हुई उदास अर्थी पर  

श्मशान-घाट

लौट आए थे 

उनकी स्मृतियों के साथ

बेबस बस ख़ाली हाथ

संस्कारों की फ़सल 

मूल्यों की अक्षय पूँजी

कुल के दायित्त्व

विश्वास का घनत्त्व  

इच्छाओं की गठरी 

बोध-कथाओं की लायब्रेरी

जीने की कलाओं का विस्तार 

देकर छोड़ गए हो संसार!  

आपकी स्मृति 

सघन परछाइयों में 

शून्य लिख जाती है

जिसके अर्थ तलाशता हुआ 

अपने पिता होने के 

अर्थ तलाशता हूँ

तस्वीर हो जाने के ख़याल में  

ख़ुद को खँगालता हूँ

नब्बे वर्ष की आयु 

निरोग जीवन जीकर

आपका महाप्रस्थान 

आपका साथी बूढ़ा नीम 

है अब मेरा मित्र महान। 

©रवीन्द्र सिंह यादव

रविवारीय अंक में पढ़िए चुनिंदा रचनाएँ (पीछे मुड़कर देखी एक झलक)-

अश्रुधारा मुक्तक 

धारा   में   पिता  भी  बहे,
तो     बहते      ही     गये ,
बहते        ही           गये।
भ्राता भी बिन बहे न रहा ,

भगिनी     भी     बही,
वह        ऐसी      बही।
वह  तो  फूट  ही  पड़ी ,
बहना हम को क्यों तुम छोड़ चलीं।

*****

अनुत्तरित प्रश्न 

सुबह से शाम तक

समय मनुष्य को खर्च करता रहता है,

और मनुष्य..,

जेब में पड़े  सिक्कों की तरह

धीरे-धीरे खर्च होता जाता है

निरन्तर अपनी जिजीविषा को

क्षीण होते देखता रहता है

छोटी-छोटी ज़रूरतों में

उसके दिन बँट कर रह जाते हैं

*****

बेटियाँ 

पाल-पोस कर बड़ा करना,
और दूसरे घर भेज देना ।
अपने कलेजे का टुकड़ा ,
किसी और को सौंप देना ।

अच्छे संस्कार अपनी बिटिया को देना ।
उसे इसी पूँजी से घर बसाते देखना ।
या एकाकी दीपशिखा-सी स्वावलंबी बनते देखना ।
पिता के आशीर्वाद का सम्मान है ना ?
पिता की नम आँखों का स्वाभिमान है ना ?

*****

वृद्धाश्रम-मुक्त समाज और सामंजस्य की आवश्यकता 

आज वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों को स्वास्थ्य और रहन-सहन की सभी भौतिक सुविधाएँ मिल रही हैं, लेकिन भावनात्मक रिक्तता बनी हुई है। जो संतान आज अपने माता-पिता को संस्थाओं के हवाले कर रही है, उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि 'समय का चक्र घूमकर वापस आता है।' भविष्य में उनके साथ भी वैसा ही व्यवहार होने की प्रबल संभावना है, जैसा वे आज अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं।

*****

सपनों का संसार 

बोध हो गया है

पर चलती रहती है साधना

संतोष नहीं होता

साधकों को

खोज ईश्वर की चलती रहती है

जहाँ नदी पार करके नाव छोड़ दी जाती है

उसी परिपक्व बुद्धि को सिद्धि दी जाती है!

*****

तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित

सारे जग मे हो रहा ,भारत का गुणगान ।

शुभ संस्कारी भावना, है इसकी पहचान ।

 है इसकी पहचान, सभ्यता बड़ी निराली ।

सर्व धर्म सत्कार, बनाता गौरवशाली ।

कहे सुधा सुन मीत, लगा लो तुम भी नारे ।

भारत देश महान, कह रहे जग में सारे।।

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव


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