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सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

2033 ..हर क़न्दील वाला मददगार नहीं होता

सादर नमस्कार
मुखातिब है दिग्विजय
इस वक्त
मूड बन आया कि लिख दें कुछ
आइए खोले पिटारा
जो हा उल्टा-सुल्टा उसे देखें

ये
जमीन है
और
हम हैं।
दरक दोनों
रहे हैं।
जमीन
की दरारों
में
गैरत की हरियाली है।


किसे दिखाओगे दिल के शब्दकोश
हर शख़्स समझदार नहीं होता,
हदे नज़र है धुंध की चादर,
हर क़न्दील वाला मददगार नहीं होता,


तुमने कभी सुनने की कोशिश ही नहीं की,
ना ही मेरे किसी बात को तवज़्ज़ो दिया,
अब दूर हो मुझसे बरसों से,
और कहते हो कि मुझे दूर क्यों किया?


फूलों से लद गई है हर शाख इन दिनों
कोई तो पूछता क्यों पत्ता उदास है

इक उम्र से रखा था जिसको सम्हाल कर
पूरा न हो सका वो सपना उदास है

रूठी हुई हैं बूंदें, बादल भी बेवज़ह
ज़िद पर अड़ा है मौसम, "वर्षा" उदास है


ठंड आतंक मचाए हुए है।रजाई से बाहर निकलने का मन नहीं करता। न नहाने का दिल करता है। जी करता है पूरे टाइम रजाई में सिकुड़े पड़े रहो। लेकिन मैं दाद देता हूं उन चोरों को जो भीषण ठंड में भी चोरी कर रहे हैं। ठंड में चोरी करना आसान काम नहीं। जब लोग अपनी-अपनी रजाइयों में छिपे-दुबके बैठे होते हैं, तब चोर उनके घरों में चोरी करने उतरते हैं। एक तरफ ठंड का सितम, दूसरी तरफ पकड़े जाने का डर। फिर भी, वे अपने कर्तव्य पर डटे रहते हैं। पापी पेट क्या-क्या नहीं करवा लेता। आज के जमाने में चोरी करना पाप थोड़े है!


9 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन संयोजन....
    मेरी ग़ज़ल को पांच लिंकों में शामिल करने के लिए हार्दिक आभार आदरणीय दिग्विजय अग्रवाल जी 🙏

    जवाब देंहटाएं
  2. जी बहुत आभार दिग्विजय अग्रवाल जी...। सभी रचनाएं शानदार हैं...

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर लिंक्स। मेरी रचना को स्थान देने के लिए विशेष आभार।

    जवाब देंहटाएं
  4. विविध रंग बिखेरता हुआ पांच लिंकों का आनंद हमेशा की तरह अपनी अलग छाप छोड़ जाता है, मुझे स्थान देने हेतु असीम आभार आदरणीय दिग्विजय जी जी - - नमन सह।

    जवाब देंहटाएं

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