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सोमवार, 9 नवंबर 2020

1940 ...उदास दिनों में क्षणभंगुर होते सबके सब

सादर वन्दे
चर्चाकारों की छुट्टियाँ
राम का नाम लो
कभी पुलिस वालों को छुट्टी करते देखा है
पुराने जमाने की कहावत है
रेल, मेल और जेल
कभी बंद नहीं होते
आज कुछ विशेष सोच है मेरी
आपको स्त्री विमर्श कुछ पढ़वाया जाए
पर अफसोस..सोचा हुआ कब हुआ किसी का
फिर भी रचनाएँ तो है न...



स्त्री जब पूछे तुमसे क्या हुआ? 
कहना सब ठीक है 

वो समझ जाएगी खुद ब खुद 
कितना ठीक है और कितना है खराब.




जग -जंजाल
झूठा यह मधुदेश
तुम विशेष।
....
तोड़ो बन्धन
करो तो आरोहण
जग-क्रन्दन।




विस्फोट यूँ हीं 
नही हुआ करते..
सब्र का ईंधन
भावनाओं का ताप
आक्रोश का ऑक्सीजन
जब मिलते हैं
सब्र गड़गड़ाता है
भावनाएँ खदबदाती हैं


बहुत हो गया अब,
छोड़ो कॉपी-किताब,
फेंक दो चाक-पेंसिल,
बंद करो भागना अब 
घंटी की आवाज़ पर.



जब सुबह आयेगी
तब नहीं आयेगी सुबह
वो आयेगी जब
तुम्हारे शहर से होकर आयेगी
जब बारिश आयेगी
तब कहाँ आयेगी बारिश
वो तो तब आयेगी



उदास दिनों में 
किससे कहे और 
क्या कहे,
कहाँ से कहे,
किस ओर से पहले
और किस ओर से नहीं ,
क्या है सही और क्या है ग़लत 
इन सबके बीच फँस जाती हैं साँसे 
...
आज बस
सादर


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