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रविवार, 1 नवंबर 2020

1932 ...बुढ़ापे को रिवर्स तो नहीं किया जा सकता

आज भाई कुलदीप जी से
संपर्क नहीं हो रहा है
 
सो आज हम हैं....
जल्दबाजी में लगी प्रस्तुति
कुछ यूं है आज...



मोहब्बत तो चाँद से बहुत पुराना है 
बचपन से लेकर आज तक याराना है 

तब देखने को तरसते मचलता था मन 
नयी उमंग उठने लगीं थीं मन में उससे 



जी!
ख़्याली
वाताली
प्रेम पगी
रची पत्राली
थामी चाय प्याली
कथा तान दे डाली।



 
पर हाँ 
चिड़चिड़े,सनकी,खूसट 
बुढा/बूढ़ी होने से 
खुद को 
बचाया जा सकता है 



बनारस की गलियों से
कुछ लीची खरीद के लाये थे,
खाने के बाद बीज फेंक दिए
घर के पिछवाड़े,


बैठे-बैठे यूं ही 
खुद से पूछ लिया 
करते क्या हो आखिर 
तुम दिन भर 
सवाल वाजिब था 
जवाब भी मुश्किल 
क्या करता रहता हूं 
मैं आखिर दिन भर 
.....
बस
सादर





7 टिप्‍पणियां:

  1. असीम शुभकामनाओं के संग हार्दिक आभार आपका
    श्रम साध्य प्रस्तुति हेतु साधुवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. बेहतरीन चयन..
    आभार..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  3. आपका बहुत शुक्रिया मेरी कविता को यहाँ शामिल करने का और अन्य कविताओं को पढ़ने का अवसर भी देने का धन्यवाद !

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही सुंदर कुछ हट कर प्रस्तुति। सभी रचनाएँ सुंदर हैं और प्रेरणादायक हैं।
    सुंदर प्रस्तुति के लिए हृदय से आभार व आप सबों को प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं
  5. सार्थक सुंदर लिंक्स,मुझे शामिल करने की लिए
    हृदयपूर्वक आभार आपका !

    जवाब देंहटाएं
  6. मेरे ब्लॉग को यहां सम्मिलित करने के लिए धन्यवाद ।

    जवाब देंहटाएं

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