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गुरुवार, 14 नवंबर 2019

1581... खिली चाँदनी धरा पर पूनम का चाँद उतर आया


सादर अभिवादन।

चलो दर्पण पर जमीं हुई 
धूल साफ़ करने का 
मुकम्मल मन बनायें,
पहले दर्पण में देखने 
भावशून्य चेहरे को 
कोमल भावों से सजायें।  
-रवीन्द्र 

आइये आज की पंसदीदा रचनाओं पर नज़र डालें-  


 

दुनियावी शोर से बेख़बर रात-दिन,
उनकी  आहट  की  इन्तज़ारी है।

हिज़्र के जाम पीकर भी झूम रहे,
अजब उनके चाहत की ख़ुमारी है।


 

मौन में मुखर हुआ सुरम्य संगीत,  
वह पागल पुरवाई-सी इतरायी,  
 खिली चाँदनी धरा पर पूनम का चाँद उतर आया
चौखट पर हसरतों ने चुपके से थाप लगायी,
 मुद्दतों बाद आज मेरी दहलीज़ मुस्कुरायी  | 


 

जमाने को मैंने देखा इस तरह 
आँखों में गिरी सूरज की किरणें 
थोड़ी सी जली लेकिन 
                            चमकदार हो गयी                 
  

 

कुल व्यथित-सा मन मेरा
तापस की लौ संग जला देना
अगर  बुझे अगन मेरी
तो हिम प्रहलाद से भिगो देना
पर निजता मेरी तुम
हर लेना। 

 

ऐसा नहीं है कि उसके द्वारा सिर्फ अपनी बात की गई है. वह गाँव में खुद

को सक्रिय बनाये हुए है. गाँव के अराजक लोगों के खिलाफ भी वह  

केवल खड़ी होती है वरन पुलिस में उनकी शिकायत भी करती हैगाँव की

महिलाओं को अत्याचार से बचाने में आगे आती है तो गाँव की बेटी के 

विवाहोपरांत आये संकट को दूर कर उसे उसके पति से भी मिलाती है. यह

चित्रण किसी भी ग्रामीण महिला के सशक्त होने की कहानी कहता है

इसी सशक्तता के चलते रमकल्लो प्रधानी के चुनावों में भी उतरती है

इसके पीछे उसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं, बालिकाओं के विकास का 

मार्ग प्रशस्त करना है. रमकल्लो की कहानी का इसे सार भर समझा जाए.

असल आनंद तो उसके पत्रों को स्वयं पढ़कर ही उठाना होगा.


हम-क़दम का नया विषय

आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे अगले गुरुवार।  

रवीन्द्र सिंह यादव 

12 टिप्‍पणियां:

  1. आज बालदिवस है। मुझे साहिर लुधियानवी का यह गीत आज भी उस नटखट बचपन की याद दिलाता है जब हम बच्चों को हमारे अभिभावक यह सुनाया करते थे-

    बच्चे मन के सच्चे
    सारी जग के आँख के तारे
    ये वो नन्हे फूल हैं जो
    भगवान को लगते प्यारे
    खुद रूठे, खुद मन जाये, फिर हमजोली बन जाये
    झगड़ा जिसके साथ करें, अगले ही पल फिर बात करें
    इनकी किसी से बैर नहीं, इनके लिये कोई ग़ैर नहीं
    इनका भोलापन मिलता है, सबको बाँह पसारे
    बच्चे मन के सच्चे ...
    इन्ससान जब तक बच्चा है, तब तक समझ का कच्चा है
    ज्यों ज्यों उसकी उमर बढ़े, मन पर झूठ क मैल चढ़े...

    सच कहा -ज्यों- ज्यों हम बड़े हुए हमारा यह भोलापन, यह निश्छलता निजी स्वार्थ के बाजारों में खोती ही चली गई। हम ईश्वरीय गुण से दूर होते चले गये, सो आये आज हम बिल्कुल बच्चों की तरह पूरा दिन गुजारें और फिर रात इसपर तनिक चिंतन करें..।
    *******
    वैसे आज विश्व मधुमेह दिवस है। यदि हम अपने दिनचर्या को नियमित रखेंगे और गरीबों के आहार पर डाका नहीं डालेंगे तो इस रोग से काफी हद तक दूर रह सकते हैं।
    रवींद्र भाई जी सहित सभी को प्रणाम।




    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर आभार भाई शशि जी... ज़रूरी सन्दर्भ का उल्लेख करने के लिये।

      हटाएं
    2. मेरी टिप्पणी पर सार्थक प्रतिक्रिया देने के धन्यवाद।

      हटाएं
  2. वाहः
    उम्दा लिंक्स चयन
    सराहनीय प्रस्तुतीकरण

    जवाब देंहटाएं
  3. जानदार प्रस्तुति...
    सुन्दर रचनाएँ..
    सादर...

    जवाब देंहटाएं
  4. आपकी लिखी भूमिका की तरह काश कि पलभर में सारी धूल साफ़ हो जाती। सुंदर पंक्तियाँ भाईचारे और सौहार्द्र का संदेश देती हुई।
    मेरी रचना शामिल करने के लिए आभारी हूँ आदरणीय रवींद्र जी।
    सुंदर प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर पंक्तियों के साथ अच्छी लिंकों का संकलन।
    शुभकामनाएँँ।

    जवाब देंहटाएं
  6. .. सुंदर प्रस्तुति ...सभी चयनित लिंक बहुत अच्छे हैं..!!👌

    जवाब देंहटाएं
  7. सार्थक भूमिका के साथ बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय.
    समय पर नहीं पहुँची. माफ़ी चाहती हूँ आप से
    मेरी रचना को स्थान देने के लिये तहे दिल से आभार आप का
    सादर

    जवाब देंहटाएं

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