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शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

1582...सुन लेते थे एक दूसरे की धडकनें

स्नेहिल अभिवादन
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बंधनमुक्त,धरा पर खींचीं सीमाओं से परे,गगन में अपने पर फैलाये उड़ते,वृक्षों में रहने वाले हमारी सृष्टि की खूबसूरत कृति है पक्षी। 
मरे जीवों को साफ करने में,खुले में फेंके अनाजों की सफाई में, 
खाद्य श्रृंखला में, पारिस्थितिकी संतुलन मे,बीजों के संवहन 
जैसे अनेकों महत्वपूर्ण योगदान पक्षियों के पर्यावरण को 
संतुलित करने में किया जाता है।
बदलते ऋतु में प्रतिवर्ष हज़ारों किलोमीटर की यात्रा करके 
प्रवासी पक्षी हमारे देश के विभिन्न क्षेत्रों को गुलज़ार करते हैं। 
यहाँ एक निर्धारित समय व्यतीत कर,मुख्यतया प्रजनन 
कार्य करते हैं और वापस लौट जाते हैं। मूल निवास स्थान 
में प्रतिवर्ष समान रुप से होने वाले जलवायु परिवर्तन के 
कुप्रभावों से बचने के लिए ये पक्षी स्वयं के लिए तुलनात्मक 
रुप से गर्म देशों में आते है जहाँ बर्फ जमती नहीं और आहार 
भी पर्याप्त मात्रा में मिलता है। ये अद्भुत मेहमान हमारे अभ्यारण्य,राष्ट्रीय उद्यानों सहित विभिन्न आर्द्र भूमि में 
अपना बसेरा बना लेते हैं। इस तरह ये पंछी हमारे देश की जैव विविधता को समृद्ध करने में अपनी मह्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 
परंतु औद्योगिकीकरण और आधुनिकीकरण के इस युग में हज़ारों 
वर्षों से हमारी मेज़बानी का अबाध रुप से उपभोग करने वाले हमारे 
इन प्यारे विदेशी मेहमानों को प्रदूषण और कम होते वृक्षों जैसी 
अनेक परेशानियों से रु-ब-रू होना पड़ रहा है। 
विदेशी मेहमानों की संख्या कम हो रही है।





यह देश ऐसी कई घटनाओं का साक्षी रहा है जहाँ जीवन के अंतिम चरण में विश्वभर में देश का नाम कमाने वाली गौरवशाली प्रतिभाओं की अत्यन्त दर्दनाक तस्वीर सामने आई है. निठल्ले नेताओं पर पानी की तरह बहाने के लिए खूब पैसा है पर उस व्यक्ति की सुध लेने का समय किसी के पास नहीं जिसकी प्रतिभा को सारी दुनिया ने सलाम किया था!
दुःख यह ही नहीं कि सड़क पर ही श्रद्धांजलि अर्पित कर इतिश्री मान ली गई, दुःख यह भी है कि बीती बातों और ऐसे अनगिनत किस्सों से कभी कोई सबक़ नहीं लिया गया....आगे भी यही होते रहना है! 

अलविदा, वशिष्ठ बाबू 🙏🙏 सादर नमन
(प्रीति अज्ञात)

★★★★★


एक नज़्म के बहाने

इश्क के ठहरे उजाले पाश में
धार से झंकृत तराने हो गए
रूह भटकी कफ़िलों में इस तरह
नज्म गाने के बहाने हो गए।

गंध साँसों में महकती रात दिन
विगत में डूबा हुआ है मन मही
जुगनुओं सी टिमटिमाती रात में
लिख रहा मन बात दिल की अनकही



हाँ हाँ जानती हूँ

बहुत व्यस्त हो तुम

एक एक मिनट है

बहुत कीमती

जैसे कभी हुआ करता था

कीमती एक एक पल मिलन का

कैसे बचाते थे एक एक घडी

और चाहते थे अधिक से अधिक

मेरे साथ होना, मेरे पास होना

दूरियों में भी होते थे

हम बहुत नजदीक

सुन लेते थे एक दूसरे की धडकनें

तुम्हे याद है वो पल

मिले थे जब तुम हमसे



चाय के बहाने 

एहसासों को सहलाती हुई
शक्कर की तरह मीठी
एक कप चाय
जब कोई पूछता है
बड़े प्यार से
तो महज वो
दूध और चायपत्ती
को उबालकर बनी हुई एक कप चाय
नहीं होती
वो एक माध्यम होती है
एहसासों को सहलाने की



कुछ जीवनोपयोगी दोहे


कलेवर :

रोज नए रंग देखकर, मन जाता है कांप। 
लोग कलेवर ओढ़ते, जैसे ओढ़े साँप।। 

मान :

पाना हो यदि मान तो, कर लो ऐसे काम। 
मिले दुआएं लोक की, जग में होवे नाम।। 


चाहे जैसा भी हो वो, हर उपाए कर लूँ,
मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरूद्वारे के चक्कर भी ,
चाहे जितनी बार हो सके लगा लूँ।
पंडित-ज्योतिष-फ़क़ीर ने तो, न जाने
कितनी बार हाथों की लकीरें भी पढ़ी हो;
उसे पाने की चाह इतनी प्रबल हो जाती
कुछ भी कर गुज़रने को जी चाहता, बस
एक बार पा तो लूँ, उसे।



और चलते-चलते
मम्मी का मोल

बच्चों के बिना बताए ही पूरी कॉलोनी को और उनके स्कूल वालों को मालूम पड़ गया कि उनकी मम्मी कहीं बाहर चली गई हैं. नेहा के हर काम को हल्का-फुल्का मानने वाले डॉक्टर मेहता को भी अब दाल-आटे का भाव मालूम पड़ रहा था. प्रीतू को अपनी मम्मी से लिपट कर सोने की आदत थी. अब उसका शिकार उसके पापा बने. डॉक्टर मेहता अपनी सोती हुई बिटिया की बाहों के फन्दे से अपनी गर्दन छुड़ाते तो उसकी टांगे उनके पेट पर आ जातीं. आखिरकार पिताश्री ने बिस्तर का त्याग कर सोफ़े पर रात बिताना ठीक समझा और प्रीतू रात भर ‘ मम्मी-मम्मी ’ कहकर सुबकती रही.

★★★★★★

उम्मीद है आज की प्रस्तुति आपको
पसंद आयी होगी।
आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहती है।

हम-क़दम के विषय के लिए
यहाँँ देखिये

कल का अंक पढ़ना न भूलेंं कल आ रही हैं
विभा दीदी एक विशेष प्रस्तुति के साथ।

#श्वेता सिन्हा

8 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात..
    सादर नमन वशिष्ठ जी को..
    बहुत बढ़िया...
    आभार..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह, खूबसूरत प्रस्तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  4. 'पंछी को छाया नहीं' हज़ारों मील उड़कर बसेरा करने को पेड़ की छाया नहीं मिलेगी पर दम घोंटू हवा मिलगी, सूखते झील-तालाब और नदियाँ मिलेंगी तो प्रवासी पक्षी क्यों आएँगे?
    महान गणितज्ञ प्रोफ़ेसर वशिष्ट का प्रेरक जीवन और दुखद अंत, निराला, नागार्जुन और मुक्तिबोध के अंतिम दिनों की याद दिलाता है. हम हीरों को कोयले में खोजते हैं लेकिन हमारे पास जो असली हीरे होते हैं उन्हें हम कोयले की तरह से जलने के लिए छोड़ देते हैं.

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर अंक , प्रिय श्वेता। अपने देश के महान गणितज्ञ वशिष्ठ जी का इस निष्ठुर दुनिया को अलविदा कहना उनकी मुक्ति और मोक्ष है। वे मुक्त हुए ,अनेक सवाल अपने पीछे छोडकर। उनको अश्रुपूरित कोटि नमन। रात टीवी पर उनका लावारिस पार्थिव शरीर देखकर मन क्षोभ और पीड़ा से भर गया और आँखे छलक गई। कुछ भूलें ऐसी ही होती है, कोई क्षमायाचना उनकी भरपाई नही कर सकती। वशिष्ठ जी कर साथ हुए अन्याय के लिए उनके परिवार से लेकर, समाज, देश सभी दोषी हैं। आपने सभी रचनाकारों को मेरी शुभकामनाएं। मेरी कंप्यूटर खराब है दो तीन दिनों से, सो रचना कर्म बाधित है। सस्नेह --

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति प्रिय श्वेता! सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर और पठनीय लिंक....स्थान देने के लिये आपका दिल से आभार

    जवाब देंहटाएं

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