सादर अभिवादन।

दुनियावी शोर से बेख़बर रात-दिन,
उनकी आहट की इन्तज़ारी है।
हिज़्र के जाम पीकर भी झूम रहे,
अजब उनके चाहत की ख़ुमारी है।

मौन में मुखर हुआ सुरम्य संगीत,
वह पागल पुरवाई-सी इतरायी,
खिली चाँदनी धरा पर पूनम का चाँद उतर आया,
चौखट पर हसरतों ने चुपके से थाप लगायी,
मुद्दतों बाद आज मेरी दहलीज़ मुस्कुरायी |
खिली चाँदनी धरा पर पूनम का चाँद उतर आया,
चौखट पर हसरतों ने चुपके से थाप लगायी,
मुद्दतों बाद आज मेरी दहलीज़ मुस्कुरायी |

जमाने को मैंने देखा इस तरह
आँखों में गिरी सूरज की किरणें
थोड़ी सी जली लेकिन
चमकदार हो गयी ।

कुल व्यथित-सा मन मेरा
तापस की लौ संग जला देना
अगर न बुझे अगन मेरी
तो हिम प्रहलाद से भिगो देना
पर निजता मेरी तुम
हर लेना।

ऐसा नहीं है कि उसके द्वारा सिर्फ अपनी बात की गई है. वह गाँव में खुद
को सक्रिय बनाये हुए है. गाँव के अराजक लोगों के खिलाफ भी वह न
केवल खड़ी होती है वरन पुलिस में उनकी शिकायत भी करती है. गाँव की
महिलाओं को अत्याचार से बचाने में आगे आती है तो गाँव की बेटी के
विवाहोपरांत आये संकट को दूर कर उसे उसके पति से भी मिलाती है. यह
चित्रण किसी भी ग्रामीण महिला के सशक्त होने की कहानी कहता है.
इसी सशक्तता के चलते रमकल्लो प्रधानी के चुनावों में भी उतरती है.
इसके पीछे उसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं, बालिकाओं के विकास का
मार्ग प्रशस्त करना है. रमकल्लो की कहानी का इसे सार भर समझा जाए.
असल आनंद तो उसके पत्रों को स्वयं पढ़कर ही उठाना होगा.
हम-क़दम का नया विषय
आज बस यहीं तक