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सोमवार, 22 अक्तूबर 2018

1193....हमक़दम का इकतालीसवाँ क़दम...वजह

जग जीवन सृष्टि का बहुमूल्य उपहार है।  मनुष्य जन्म से लेकर जीवन के अंत तक किसी न किसी वजह से अपने कर्मपथ पर क्रियाशील रहता है। जीवन भर दुख-सुख की वजह का आकलन करता मनुष्य प्रकृति के सुलझे अनसुलझे प्रश्नों से जूझता रहता है।
जीवन क्याहै?
क्यों है?
अपने  मनोभावों के उतार-चढ़ाव की वज़ह समझने की कोशिश करता हुआ संपूर्ण जीवन व्यतीत कर देता है।

वज़ह शब्द का अर्थ कारण,हेतु या प्रकृति, तत्त्व  है।

हमक़दम के विषय वज़ह पर हमारे रचनाकारों ने एक बार फिर से अपनी लेखनी की श्रेष्ठता सिद्ध की है।
एक से बढ़कर एक सारगर्भित और पठनीय रचनाओं के द्वारा सार्थक संदेश प्रेषित किया है।
आप सभी बहुमूल्य रत्नों का हृदयतल से आभार व्यक्त करते हुए आइये चलते है आपके रचनाओं के  मोहक संसार में-

आदरणीय जफ़र जी


इस कसमकश की वजह भी तभी जान पायेगा,
दुनिया की तमाम वजहों से जब फ़रिक हो जायेगा,

बारिशो में भीग कर देख,तेज़ धूम में घूमकर आ,
वजह की ज़िद में ज़िन्दगी का मज़ा नही ले पायेगा,

ये हालात तेरे ही फैसलों के हासिल हैं,

बेवजह,वजह की बहस के पीछे कबतक चेहरा छुपायेगा
★★★★★
आदरणीय सुप्रिया रानू जी
ये मुस्कुराता चेहरा,ये दृढ़ मन

तुम्हारा ही स्वरूप

एकदम तुम्हारे जैसा तन

जननी हो तुम 

मुझे सृजित करने वाली

और मेरे जीवन की वजह हो तुम
★★★★
आदरणीया अनीता सैनी जी

एक  अरसा  गुजर  गया  तुम्हें  मुस्कराये   हुये, 
महफ़िल  में   ख़ामोशी   की  क्या  थी  वज़ह l 

मायूसी  का   लिवाज   लपेट  लिया   बदन  से ,
ख़ुमारी चढ़ी  मन  में  सादगी  की  क्या थी वज़ह 
★★★★★

आदरणीया रेणु जी

जाने कब से जमा है भीतर --
दर्द की अनगिन तहें , 
जख्म बन चले नासूर - 
अब तो लाइलाज से हो गए ; 
मुस्कुरा दूँ मैं जरा सा -- 
वो वजह बन जाना तुम ! ! 
★★★★★
आदरणीया साधना जी

यह जीवन से वितृष्णा का प्रतीक है
या फिर उम्र के साथ अहसास भी
वृद्ध हो चले हैं कि अब
जीने की कोई वजह ही
नज़र नहीं आती !
★★★★★
आदरणीया कुसुम जी
मिसाल कोई मिलेगी
उजडी बहार में भी
उस पत्ते सी
जो पेड़ की शाख में
अपनी हरितिमा लिये डटा है
★★★★★
आदरणीया अभिलाषा जी
होती तो ये जद्दोजहद न होती।
आंखों में सिमटी हुई आशाएं
पलकों में बंद जाने कितने सपने
कोई तो वजह होगी इनके होने की
तभी तो आस जगती है जीने की वजह
★★★★★★
आदरणीया अभिलाषा जी
तब चमकती एक चिंगारी
अंतस में कर देती उजास
जो होती जिजीविषा
खींच लेती मनुष्य को
समस्त मायाजाल से
बनकर जीने की वजह
★★★★★
आशा सक्सेना

अनगिनत जल कण उड़ते
बहते हुए झरने से
कोलाहल बेवजह होता
गिरते हुए निर्झर से
कुछ ऐसा ही हाल हुआ
प्रश्नों का अम्बार लगा
क्यूँ, क्या, किस लिए,
किसके लिए और
★★★★★
चलते-चलते आदरणीय सुधा जी की रचना

इसी वजह से चंदा मामा
कभी-कभी नहीं आते हैंं....
घुप्प अंधेरे नभ में कुछ दिन
बस तारे टिमटिमाते हैंं.......
और सूरज दादा दुखी, खिन्न,
कभी दीन, नरम हो जाते हैं,
ठिठुर-ठिठुर सर्दी में जब,
हम  धूप ढूँढने जाते हैं.......।
★★★★★
आपके द्वारा सृजित यह अंक आपको कैसा लगा कृपया 
अपनी बहूमूल्य प्रतिक्रिया के द्वारा अवगत करवाये
 आपके बहुमूल्य सहयोग से हमक़दम का यह सफ़र जारी है
आप सभी का हार्दिक आभार।


अगला विषय जानने के लिए कल का अंक पढ़ना न भूले।
अगले सोमवार को फिर उपस्थित रहूँगी आपकी रचनाओं के साथ।

श्वेता

21 टिप्‍पणियां:

  1. श्रम साध्य काम..
    साधुवाद...
    शुभ प्रभात..
    सादर...

    जवाब देंहटाएं
  2. जाने कब से जमा है भीतर --
    दर्द की अनगिन तहें ,
    जख्म बन चले नासूर -
    अब तो लाइलाज से हो गए ;
    मुस्कुरा दूँ मैं जरा सा --
    वो वजह बन जाना तुम ! !

    फिर से सुंदर और भावपूर्ण प्रस्तुति के लिये आपका और सभी रचनाकारों का हृदय से आभार श्वेता जी, प्रणाम

    जवाब देंहटाएं
  3. साथ ना चल सको -
    मुझे नहीं शिकवा कोई ,
    मेरे समानांतर ही कहीं -
    चुन लेना सरल सा पथ कोई ;
    निहार लूंगी मैं तुम्हे बस दूर से -
    मेरी आँखों से कभी- ओझल ना हो जाना तुम ! !

    रेणु दी भावुक करने वाली हैं हर पंक्तियाँ, एक छोटी सी उम्मीद में जीवन गुजारने की अभिलाषा।
    मेरा प्रणाम स्वीकार करें और ज्वर उतरा की नहीं..?

    जवाब देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुप्रभात,
      आदरणीय स्वेता जी इस विशेष अंक के लिये बधाई।एक से बढ़कर एक रचनाये पड़ने को मिल रह हैं।एक ही विषय पर रचनात्मकता का पिटारा खुल पड़ा हैं।
      आभार जफ़र को भी स्थान देने के लिए।

      हटाएं
  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति श्वेता जी।

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुती |
    मेरी रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद |

    जवाब देंहटाएं
  7. शुभ प्रभात सभी गुणीजनों को... बेहद सुंदर प्रस्तुति और चित्रों का चयन भी एकदम सटीक है स्वेता जी...
    मेरी छोटी छोटी कोशिशों को हकचल के विस्तृत आयाम में सम्मिलित करने को हृदय से आभार...एक से बढ़कर एक रचनाएँ नमन सभी कलमकारों को

    जवाब देंहटाएं
  8. शुभ प्रभात आदरणीय

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति श्वेता जी
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए बहुत बहुत आभार
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत सुंदर प्रस्तुति.. सभी रचनाकारों को बधाई
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  10. इतनी खूबसूरत और सारगर्भित रचनाओं के बीच अपनी रचना देख कर आनंदित हूँ ! मेरी रचना को चुनने के लिए आपका हृदय से धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी ! सभी चयनित रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं अभिनन्दन !

    जवाब देंहटाएं
  11. बहुत ही उम्दा प्रस्तुति श्वेता जी, लाजबाव रचनाएं
    एक से बढ़कर एक जीने की और जिंदगी की
    वजह बनती हुई। सभी रचनाकारों को नमन।
    मेरी रचनाओं को स्थान देने के लिए आपका आभार 🙏

    जवाब देंहटाएं
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    जवाब देंहटाएं
  13. शानदार प्रस्तुतिकरण,लाजवाब लिंक संकलन....
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद एवं हार्दिक आभार श्वेता जी ।

    जवाब देंहटाएं
  14. शानदार प्रस्तुति सारगर्भित भुमिका।
    सुंदर लिंक पढवाये आपने, सभी रचनाकारों की काव्य क्षमता को नमन,मेरी रचना को स्थान देने के लिये सस्नेह आभार।
    सभी रचनाकारों को बधाई

    जवाब देंहटाएं
  15. वाह!!श्वेता ,बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुति ।

    जवाब देंहटाएं

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