निवेदन।


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मंगलवार, 7 अक्टूबर 2025

4533..इतना भी ना आओ याद

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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स्वागतम् स्वागतम्
शीतल शरद सुस्वागतम्।


धान चुनरी,कँवल,कुमदिनी,
नीलकुंरिजी  मनभावनम्।
मगन किलके अलि,तितली
खंजन खग गुंजायनम्।
शरद विहसे चंद्रिका महके
सप्तपर्णी  सम्मोहनम्।
 धरणी चूमे ओस मुक्ता
शिउली झरे अति पावनम्।

स्वागतम् स्वागतम्
शीतल शरद सुस्वागतम्।

#श्वेता
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आज की रचनाएं 


कभी न ख़त्म होने वाला अहसास
हम दोनों का, सुख-दुःख का
इश्क़, मुहब्बत से गुज़रे हर उस वक़्त का
बुना था जिसे लम्हा-दर-लम्हा
नज़र-ब-नज़र हम दोनों के दरमियाँ ...



उड़ें हवा संग, हों काफ़ूर 
बहकर यहाँ से जायें दूर, 
नीला गगन स्वच्छ निर्मल पर 
सदा अचल, रहे अडिग हुज़ूर !

तुम भी तो कुछ उसके जैसे 
कहाँ ख़त्म होती है सीमा, 
हर पल नया रूप धर आये 
दिखे न परिवर्तन, हो धीमा 




इतना भी ना आओ याद कि बारिश भी सहम जाए
बिन मौसम छाए बादल और भरी ऑंख बरस जाए
बिन तेरे इक पल ऐ संगदिल सनम गुजरता ही नहीं 
दिल बड़ा मासूम है संभाले से भी सम्भलता ही नहीं ।




ग़ैरों ने जो सुलूक किया उसका क्या गिला
फेंके हैं दोस्तों ने जो पत्थर समेट लूँ

कल जाने कैसे होंगे कहाँ होंगे घर के लोग
आँखों में एक बार भरा घर समेट लूँ



 विडंबना यह है कि घर की बुज़ुर्ग स्त्रियाँ ही उसका आकाश छोटा करती हैं। वही स्त्रियाँ जिन्होंने अपने जीवन में ऐसी ही रुकावटों का अनुभव किया था, अब अगली पीढ़ी की राह रोकने वाली चौकीदार बन जाती हैं। यह पराजय साधारण नहीं, क्योंकि यह लड़ाई पहले स्त्री और स्त्री के बीच लड़ी जाती है, फिर स्त्री और पुरुष के बीच का घमासान बनती है। जब बालिका अपनी नज़दीकी स्त्रियों, जैसे माँ, दादी या बुआ से समर्थन चाहती है, तो उसे परंपराओं का बोझ और अवरोध मिलता है।

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आज के लिए इतना ही 
मिलते हैं अगले अंक में।

सोमवार, 6 अक्टूबर 2025

4532...सपने बड़े बड़े थे, साधन बहुत सीमित थे, पर रास्ता बड़ा कठिन था

 सादर नमस्कार

रविवार, 5 अक्टूबर 2025

4531 ...अगर मैं कुत्ता होता तो.. क्या वफादार होता ?

 सादर नमस्कार

रविवार को फिर
ज़िन्दगी है जब तक तू जीवित है फ़िज़ा
मरकर भी क्या कोई जी सका है यहाँ !!

चलिए चलें





मधुर तृप्ति का भाव जगा जो
अतृप्ति का भी घाव लगा जो,
चैन और बेचैनी उर की
तेरे चरणों पर रखते हैं !

शांति औ' आनंद की मूरत
देवी ! तू अज्ञान को हरे,
तू ही भरे रंग माया के
हर वर माथे पर धरते हैं !






निर्वस्त्र हुए वृक्षों पर
पक्षियों के रहस्य और
हैं धमनियों के जाल;


टूटे,झरे,निराशा के ठूंठ पर
नन्हीं,कोमल,आशाओं से भरी
पत्ती मुस्कुराती है;
नारंगी भोर कुलांचे भरकर
टहक सांझ में बदल जाती है।





पुलकों  में  समाविष्ट   मन  की   हलचल  का   तार
अंतर्मन  को   जो   संदेशा  भेजता  बार  - बार
परिधि  में  बंध   एक   फेनिल  सा  उजास
ज्यों - ज्यों  मथ ता  जाता  दूषित  अंधियारा
मिट  गह्वर  में  भी  प्रकाश  तब  नजर  आता
अभिमान  में  रत  भूला  फिर  वापस  अपने  घर  को  आता




कुत्ता होता मैं
धोबी का छोड़ कर किसी का भी होता
कहते हैं कुत्ता वफादार होता है
अगर मैं कुत्ता होता तो..
क्या वफादार होता ?
ये अलग प्रश्न है





कल रावण मेरे सपने में आया
परेशान था और झल्लाया
बोले में रावण हूं
दुनिया में नंबर वन हूं
मेरे पास अतुलित दौलत है
बाहुबली हूं ,मुझ में ताकत है
कोई मुझसे मेरे हथियारों के कारण डरता है 
कोई मुझसे मेरे स्वर्ण भंडारों के कारण डरता है






खेल ज़िंदगी के तुम खेलते रहो यारों
हार जीत कोई भी आखिरी नहीं होती

बस कल फिर

शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

4530 ,,हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के दिग्गज पंडित छन्नूलाल मिश्र का 91 वर्ष की आयु में निधन

 सादर अभिवादन

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

4529... यात्रीगण कृपया ध्यान दें...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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आइये पढ़ते हैं आज की रचनाएँ-


सोचते दिन-रैन हैं
पसरते पूँजी के पाँवों तले 
दब गई है चीत्कार भूखों की 
अब नहीं टोकती 
प्रबुद्ध मानवता 






सपने, जो तुम बुनती हो मुझको लेकर,
रंग नए नित भरती हो, इस मन की चौखट पर,
हृदय, उस धड़कन की बन जाऊं,
कहीं दूर भला, कैसे रह पाऊं!

मन चाहे, अनुरूप तेरे ढ़ल जाऊं...

बहती, छल-छल, तेरे नैनों की, सरिता,
गढ़ती, पल-पल, छलकी सी अनबुझ कविता,
यूं कल-कल, सरिता में बह जाऊं,
कविता, नित वो ही दोहराऊं!



अति गर्वित कोदंड है,  सज काँधे श्रीराम ।
हुआ अलौकिक बाँस भी, करता शत्रु तमाम ।।
करता शत्रु तमाम, साथ प्रभुजी का पाया ।
कर भीषण टंकार, सिंधु का दर्प घटाया ।।
धन्य धन्य कोदंड, धारते जिसे अवधपति ।
धन्य दण्डकारण्य, सदा से हो गर्वित अति ।



अभी तक लोग रेल चलने पर उछल-उछलकर खुशी मना रहे थे। चेतावनी है—ज्यादा मत उछलिए! ज्यादा इतराने से सबको जलन होती है, और मुझे भी वही हुआ है।

पहली बार जब चालक दल गाड़ी लेकर आया तो ऐसा स्वागत हुआ मानो बारात चढ़ आई हो। अब सोचिए, इतनी खुशी किसी को बर्दाश्त होती है क्या?



आशा करते हैं आप इस अद्यतन को अपेक्षा के अनुरूप पायेंगे. जिन जिन के लिए सम्भव होयदि पोस्ट्स पर कमेंट्स भी लिखे जा सकें तो आनन्द और भी बढ़ेगा. यदि आप भी अपनी स्वयं की या आपकी रुचिकर कृतियों को यहाँ प्रकाशित करवाना चाहते हैं तो उक्त कृतियों को फोटो (सन्दर्भजहाँ आवश्यक हो) के साथ ईमेल करने की कृपा करें. आपके हितकर सुझावों का सदैव सहर्ष स्वागत है. 





साहित्य केवल भावनाओं या कल्पनाओं का खेल नहीं है। वह लेखक के जीवनानुभव, संवेदनशीलता, ज्ञान और दृष्टि की उपज है। एक उत्कृष्ट रचना के पीछे वर्षों का अध्ययन, आत्ममंथन और लेखकीय साधना निहित होती है। समय की तो बात ही अलग है। फिर भी हिंदी में प्रायः लेखन को ‘त्याग’ और ‘सेवा’ के चश्मे से देखा गया। परिणाम यह कि लेखक को उसके हिस्से का उचित आर्थिक मान-सम्मान नहीं मिला। ऐसे प्रतिकूल वातावरण में विनोद कुमार शुक्ल जैसे मितभाषी, अंतर्मुखी और गहन साहित्यकार के लेखन का आर्थिक मूल्यांकन होना सुखद अनुभव कराता है। यह हमें स्मरण दिलाता है कि लेखक का श्रम उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी वैज्ञानिक, शिक्षक या कलाकार का।






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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

4528...एक दिन… यह धीरे-धीरे यूँ ही मर जाएगा...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

चित्र साभार: गूगल 

चित्र साभार: गूगल 

चित्र साभार: गूगल 

*****
           आज दशहरा पर्व और गांधी-शास्त्री जी जयंती है। असत्य पर सत्य की विजय का दिवस विजयदशमी देशभर में हर्षोलास के साथ मनाया जाता है। भारत में त्योहार सांस्कृतिक समृद्धि के प्रतीक हैं,इनकी गरिमा बनाए रखना समाज का दायित्व है।    

         सत्य, सादगी और शालीनता के लिए विख्यात दो महान हस्तियाँ मोहनदास करमचंद गांधी जी व लाल बहादुर शास्त्री जी को उनकी जयंती पर देश कृतज्ञ भाव से स्मरण कर रहा है। हमारी ओर से श्रद्धा सुमन अर्पित हैं। 

दशहरा पर्व की ढेरों शुभकामनाएँ।   

गुरुवारीय अंक में पढ़िए ब्लॉगर डॉट कॉम पर प्रकाशित ताज़ा रचनाएँ-

 मनःस्थिति

और..,

बहुत सारी बातें किसी शेल्फ़ में रखे

सामान की तरह

गर्द की परतों तले दब कर

समय के साथ

अर्थहीन होती चली जाएँगी।

*****

देवी माँ

न निर्णय ले

न संदेह से भरे

बस थम जाये

और पहुँच जाये उस अनंत में

जो आधार है सृष्टि का!

*****

प्रभु श्री राम का कोदंड धनुष

कांधे सज कोदंड दंड दे, दुष्टों का संहार करे

धर्मयुद्ध में सत्य जिताकर, अभिमानी पर वार करे

तीरों ने जिस तन को बेधा, उसको अमर बनाए थे

मर्यादा ने मर्यादा रख, अद्भुत अस्त्र उठाए थे

*****

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जीवनी - लेख

गांधीजी के विचार और सिद्धांत

महात्मा गांधी ने अपने जीवन में कई महत्वपूर्ण सिद्धांत अपनाए, जिनसे उन्होंने पूरे विश्व को प्रेरित किया।

1. सत्य (Truth) – उनके लिए सत्य ही ईश्वर था।

2. अहिंसा (Non-violence) – उनका मानना था कि हिंसा से स्थायी समाधान संभव नहीं है।

3. सत्याग्रह (Satyagraha) – अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रतिरोध।

4. सादा जीवन, उच्च विचार विलासिता से दूर रहकर आत्मसंयम।

5. स्वदेशी विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और देशी वस्तुओं का प्रयोग।

6. सर्व धर्म समभाव सभी धर्मों को समान मानना और उनके मूल्यों का सम्मान करना।

*****

बिगड़ती विश्व-व्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र

यह सब उनके निजी विचार हैं या अमेरिकी जन-मानस भी ऐसा ही सोचता है, यह जानने का कोई तरीका नहीं है, पर इसके गहरे निहितार्थ हैं. उन्होंने साझा मानवता के विचार को नकार दिया है और संप्रभु राज्यों के दायरे से परे अंतर्राष्ट्रीय समाज की अवधारणा को खारिज कर दिया है.

इस प्रकारउन्होंने मानवाधिकारों या पर्यावरण की रक्षा के कर्तव्य जैसी अवधारणाओं की नींव को कमजोर किया हैजिस पर पृथ्वी पर सभी जीवित प्राणी निर्भर हैं. ये अवधारणाएँ संप्रभु राज्य की संकीर्ण प्राथमिकताओं से परे संबंधों पर आधारित हैं.

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 

बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

4527..कुछ अनकही..

 ।।प्रातःवंदन।।

"नवरात्रि की धुन है

शुभ,संकल्पों की गुण है

उपासना के कई तरीक़े

शक्ति स्वरूपा की धुन है।"

प्रभाती की धुन आजकल इसी से सज रहीं, प्रस्तुति के क्रम को बढाते हुए नजर डालें..


दुर्गापाठ

1
बेटी के जन्म पर जिसका परिवार रोता है,
 उसके घर भी आजकल दुर्गा पाठ होता है!

✨️



ज़ुबिन की याद में

 


पिछले दिनों असम के मशहूर गायक ज़ुबिन गर्ग की 52 साल की उम्र में एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उनकी अंतिम यात्रा में गुवाहाटी में एक जन-सैलाब देखा गया। लिम्का बुक ऑफ रेकॉर्ड्स में इसे किसी अंतिम यात्रा में इतिहास का चौथा सबसे बड़ा जन-समागम बताया गया। असम के दिल की धड़कन पर तीन छोटी-छोटी कविताएं। 

✨️

एक दिन साथ प्रातः भ्रमण करने वाले मेरे मित्रों ने मेरी यह हरकत देख ली। उन्होने मुझे वृक्ष से बहुत देर बात करते देखा तो आश्चर्य से पूछने लगे, "पंडित जी! वहाँ का हौ?" मैने उन्हें पूरी बात नहीं बताई कि कवियों के एक जोड़े को प्रकाशक ने उल्लू बना दिया है, बस इतना ही कहा, "वहाँ उल्लू का एक जोड़ा रहता है।" मित्र

✨️

अनकहा

कविता की तरफ लौटता मनुष्य

कविता की बात नहीं करता

प्रेम की तरफ लौटत

अंधविश्वासी बन जाता है

जीवन की तरफ लौटता ..

✨️

अपनी अपनी ज़रूरत के तहत साथ चलने

का इक़रार रहा, रात घिरते ही अपने

अलावा किसी का भी न इंतज़ार

रहा, न जाने कितने क़ाफ़िले

गुज़रे न जाने कितने

सितारे डूबे और

उभरे, ज़िन्दगी

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह 'तृप्‍ति'...✍️


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