आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
स्वागतम् स्वागतम्
शीतल शरद सुस्वागतम्।
धान चुनरी,कँवल,कुमदिनी,
नीलकुंरिजी मनभावनम्।
मगन किलके अलि,तितली
खंजन खग गुंजायनम्।
शरद विहसे चंद्रिका महके
सप्तपर्णी सम्मोहनम्।
धरणी चूमे ओस मुक्ता
शिउली झरे अति पावनम्।
उड़ें हवा संग, हों काफ़ूर
बहकर यहाँ से जायें दूर,
नीला गगन स्वच्छ निर्मल पर
सदा अचल, रहे अडिग हुज़ूर !
तुम भी तो कुछ उसके जैसे
कहाँ ख़त्म होती है सीमा,
हर पल नया रूप धर आये
दिखे न परिवर्तन, हो धीमा
फेंके हैं दोस्तों ने जो पत्थर समेट लूँ
आँखों में एक बार भरा घर समेट लूँ
मिलते हैं अगले अंक में।
























