शीर्षक पंक्ति: आदरणीया नूपुरं जी की
रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक में चुनिंदा रचनाएँ-
(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं की
विषय-वस्तु से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर
डॉट कॉम पर जो स्तरीय एवं पठनीय प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत
किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान
करता है।)
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स्याही में खोया संघर्ष
सोच रही हूॅं ...
मुझे नहीं समझ राजनीति की,
मैं खोना नहीं चाहती तर्क के ज़ाल फेंकते
वामपंथी,दक्षिणपंथी या विचारधाराओं की आड़ में
विष वमन करते क़लमधारियों की
मन में सवाल तैर रहे हैं—
क्या पढ़ाई की परिभाषा केवल कुछ नामों तक सीमित है?
या फिर उन हज़ारों बेटियों के पसीने में भी
वही मशाल जल रही है?
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जीने की कला
धन मिला, पर बुझ गया मन
यश मिला, पर ढल गया तन
घर बनाया एक सुंदर
किंतु छायी ग़र थकन!
पूर्ण होकर भी,
अधूरे ही रहेंगे
वे सपन!
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मैं अनभिज्ञ
मै हतप्रभ, सुनता रहा शब्दों
का झुनझुना,
व्यथा गढ़े, शब्दोऺऺऺ की अभिव्यऺजना,
ना-समझी की, हद थी,
रहा शेष, कितना कुछ सुनना!
कैसे पढ़ लूं, मन की
व्यक्त-अव्यक्त रचना?
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यात्रा में हैं सभी
व्योम से विशाल
नयनों में
जगत के दुख समा
जाते ।
स्वच्छ मन स्फटिक
जैसे
बरबस आनंद मग्न
हो जाते ।
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रस का सबंध विचार से /रमेशराज
जब आचार्य शुक्ल, डॉ. नामवर, डॉ. जगदीश गुप्त, डॉ. राकेश गुप्त, डॉ. नगेन्द्र 'रसनिर्णय' में अर्थनिर्णय की भूमिका को जानते, पहचानते थे तो होना तो यह चाहिए था कि
वे इसे आधार मानकर रस में विचार की भूमिका का समावेश कराते। अगर ऐसा हो जाता तो
आधुनिक कविता रसाभास, रसहीनता जैसी स्थितियों से अवश्य उबर जाती और इसका परिणाम यह होता है कि
काव्य में विचार-प्रधान कविता के लिए 'बुद्धि रस' जैसे शिगूफे भी
सामने न आते। हां, इसके लिए कुछ नए रसों की खोज अवश्य करनी पड़ती। यह कार्य भी कोई अटपटा
अशास्त्रीय नहीं होता क्योंकि रस परंपरा में रसाचार्यों ने आगे चलकर कई नए रसों को
जोड़ा है। रस तालिका पहले भी अधूरी धी और आज भी अधूरी है।
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मोहन राकेश की कहानी-दृष्टि
मोहन राकेश ने अपनी आलोचनात्मक दृष्टि में यशपाल जैसे
वरिष्ठ कथाकारों की सीमाओं को भी रेखांकित किया। उन्होंने माना कि यशपाल ने
मध्यवर्ग की विसंगतियों पर प्रहार तो किए, परन्तु उनका यथार्थ 'एकांगी' था। यशपाल को नग्नता के चित्रण का इतना आग्रह रहा कि वह कई बार एक 'फोबिया' सा प्रतीत होता था। राकेश का मत था कि केवल कुत्सित ही यथार्थ नहीं है। जिस
मनुष्य से उसकी मनुष्यता का विश्वास ही छीन लिया जाएगा, उसे बदला कैसे जा सकेगा? राकेश की दृष्टि
में, मध्यवर्ग की स्त्रियाँ केवल देह की भूख या 'प्रतिष्ठा के बोझ' की मारी हुई
पात्र नहीं हैं, वरन् वे माताएँ भी हैं जो अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए आँखें फोड़कर काम करती
हैं। राकेश चाहते थे कि कटाक्ष और व्यंग्य के साथ सहानुभूति का भी मेल हो, तभी रचना का महत्त्व स्थाई हो सकता है। यह संतुलन ही राकेश की कहानी-दृष्टि
को विशिष्ट बनाता है, जहाँ वे यथार्थ
की कड़वाहट को स्वीकारते हुए भी मानवीय संभावनाओं का दामन नहीं छोड़ते।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
बेहतरीन अंक
जवाब देंहटाएंआभार
सादर
वंदन
अब सिर्फ कहानी ही नही कविताए भी
जवाब देंहटाएंसादर आमंत्रित है
अगला अंक 16 अगस्त 26 को
इसके लिए रचना प्रेषण तिथि 14 अगस्त 26 तक
नया विषय है आजादी, स्वतंत्रता, उड़ान
पिछला अंक देखिए
https://halchalwith5links.blogspot.com/2026/08/4823.html
शानदार अंक
जवाब देंहटाएंदेर से आने के लिए खेद है, अति सुंदर प्रस्तुति, 'मन पाये विश्राम जहाँ' को स्थान देने हेतु बहुत बहुत आभार रवींद्र जी!
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