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मंगलवार, 18 अगस्त 2026

4838....खुल रहे मन के बंधन आज...

 मंगलवारीय अंक में
आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
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कभी जब मन उदास हो तो  कुछ भी नहीं अच्छा नही लगता और कभी नभ में उड़ता अकेला पक्षी भी मन को आशा से भर देता है। इसी तरह किसी की लिखी अच्छी, रौशन बातें पढ़कर भी मन उत्साह से भर सकता है।
वर्तमान दौर के
नकारात्मकता की भीड़ को परे धकेलकर
आइये क्यों न कुछ सकारात्मक विचारों को आत्मसात करें-
अपने जीवन में अच्छे बुरे बदलाव का कारण सिर्फ़ और सिर्फ़ हम स्वयं होते हैं। दुनिया हमारे अनुसार चलेगी ऐसा सोचने से बड़ी बेवकूफी कुछ नहीं है।
कहीं पढ़ा था-
"जब आप उड़ने के लिए पैदा हुए हो, तो जीवन में रेंगना क्यों चाहते हो?"
“तुम सागर की एक बूंद नहीं हो। तुम एक बूंद में सारा सागर हो।”
"अपने शब्दों को ऊँचा करो आवाज को नहीं! बादलों की बारिश ही फूलों को बढ़ने देती है, उनकी गर्जना नहीं।"
दुनिया की परवाह करके दुखी होने से बेहतर है स्वयं से प्रेम करो, आनंद में रहो।
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आज की रचनाऍं-

मुस्कुरा रही वो आते-जाते


तृण पात सारे डोल रहें हैं

मन की परतें खोल रहें हैं

धीरे धीरे मद्धम मद्धम

कानों में कुछ बोल रहें हैं

बूंदों से आह्लादित मन

जंजीरें कितनी तोड़ रहे हैं

खुल रहे मन के बंधन आज, झींगुर प्रिय के गीत सुनाते

तरुण मिलन की आयी बेला, मुस्कुरा रही वो आते जाते


चॉंद की महफ़िल में


खिड़की से परदा थोड़ा सा खिसका है 
कोई होने का अहसास दिलाता है 

फूल पे बैठी तितली भौँरे चले गए 
भींगे मौसम से पत्थर बतियाता है 


आज़ादी : एक निरंतर संकल्प


प्रेम प्यार और हँसी-खुशी से

जीवन लहर लहराने को।


अपनेपन का बीज हर एक 

मन में बोते जाने को।


स्वार्थ का कूड़ा छींट-फटककर

जीवन से हटवाने को।


ख़्याल



होने वाला है क्या?

जो हैं बिछड़ गए हमसे ।

करते होगें 

याद हमें क्या ?

या ,फिर भूल गए होंगे 

या ,फिर बस गई होगी उनकी 

कोई नई दुनियाँ ......


राखी भेजना भूल न जाना


वर्षा की बूँदों से सजी हुई है धरती,

काजल से काले बादल घिरें कभी,

घुल-घुल बरखा की लग जाए झङी।

स्मृतियों के मयूर तब पंख फैलाएंगे,

छम-छम करते मेघ मल्हार गाएंगे।

पानी के बुलबुले, बचपन की यादें,

काग़ज़ की नाव जल में तैराएंगे !


धीरज नहीं तो धर्म कहॉं?



आज 3:30 बजे जग कर जल्दी जल्दी तैयार होकर, सपत्नीक  पंचबदन स्थान शिव मंदिर गया। पिछले सोमवार से अधिक भीड़। डेढ़ घंटा लाइन में लगे। जब नजदीक पहुंचने को थे तो कई लोग जबरन प्रवेश कर रहे थे। मेरे पीछे भी एक आकर लग गया। डांट कर कहा, " यह कैसा धर्म ? तो दांत निपोर दिया। पुलिस का एक जवान था, बोले तो उसने भी कहा, क्या करें सर, आप लोग ही कहते है, रहने दीजिए, तभी होता है...!




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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।

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