।।प्रातःवंदन।।
"सत्य का एक चेहरा होता है
रंगहीन भी नहीं होता सत्य !
लेकिन झूठ की तरह
हर कहीं नहीं होता सत्य
न ही झूठ में घुल पाता है
अगर होता है कहीं तो
अलग से दिव्या आलोक लिए
दमकता रहता है सत्य !"
गोविंद माथुर
बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के साथ आज शामिल रचनाए को देखिए ..✍️
शहर त्रस्त था
अँधेरों से।
उन्होंने
संविधान में संशोधन किया
और
अँधेरे का नाम
उजाला रख दिया..
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सावन में भगवान शिव की महिमा पर रोला छंद
परिचय
सावन आते ही मन भोलेनाथ की भक्ति में रम जाता है। चारों ओर बम-बम भोले की गूँज और शिव ..
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बदल जायेंगे मन के मौसम , बेवजह यूँ ही मुस्कुराइए
छँट जाएँगे ग़म के सारे बादल
हर रात लाती है सुबह ये जान जाइए ..
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नियति की
हर क्रिया में
कर्म की प्रतिक्रिया सा
निर्बाध निर्विरोध
लेता हूं अवश्य ही
प्रतिशोध..
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सरगोशियों के स्वर
‘या निशा सर्व भूतानां तस्यां जाग्रति संयमी’ – अर्थात जो सब जीवों के लिये रात्रि है, वह आत्मविश्लेषी मुनियों के लिए दिन है। प्रोफ़ेसर (डॉक्टर) सुशील कुमार जोशी एक ऐसे ही साहित्यिक मनीषी हैं जो अपने ‘उलूक’ के साथ अपनी ‘सरगोशियों के स्वर’ में समकालीन समाज के विश्लेषण को अभिव्यक्ति देते हैं। उलूक अर्थात उल्लू एक निशाचर पक्षी है। यह मुख्य रूप से रात में सक्रिय होता है और अत्यन्त सतर्क निगाहों से बिना किसी आहट के अपना आखेट ढूँढ लेता है। ज़ाहिर है, अपने ‘उलूक’ के साथ विचरण और कानाफूसी करते डॉक्टर जोशी आज के समाज की उन तमाम विसंगतियों को बड़ी आसानी से पकड़ लेते हैं और अत्यन्त सूक्ष्मता से उसका तार-तार उधेड़ देते हैं। कवि डॉक्टर जोशी का प्रस्तुत कविता संग्रह ‘सरगोशियों के स्वर’ उसी तार-तार हुए समाज के सच का बड़ा मर्मस्पर्शी उद्गार है। सत्तर कविताओं का यह संग्रह अपने आस-पास के जीव..
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️
सुंदर अंक
जवाब देंहटाएंआभार
सादर
वंदन
सुंदर संकलन। हार्दिक आभार। प्रातः वंदन।
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