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रविवार, 2 अगस्त 2026

4822...सच ही सोचेंगे सच ही खोदेंगे ...

 शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ.सुशील कुमार जोशी जी की रचना से.

सादर अभिवादन.

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ (अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंदपरिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

भार्गव राम खण्डकाव्य - 43

मंच  पर शोभित था  पिनाक,

जयमाल शोभित सिया हाथ।

जो  वीर पिनाक तीर संधान,

गले जयमाल  सिया के हाथ।।

*****
सारी बोझिलता ,थकान, 
एकाकीपन समर्पित कर
अंधेरे को
सॉंझ की बाती
मौन प्रार्थना में
 प्रज्जवलित करती है
भोर के प्रति विश्वास...।

*****
अंतिम बूंद - -
हाथों में,
*****
*****
फिर मिलेंगे।
 
रवीन्द्र सिंह यादव 


2 टिप्‍पणियां:

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