शीर्षक पंक्ति: आदरणीया अनीता जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय अंक में पढ़िए कुछ लघुकथाएँ,
कुछ कविताएँ-
“छड़ी तो सिर्फ़
ज़मीन का सहारा देती है, मालती… तुम्हारा हाथ
थामता हूँ तो मन को सहारा मिलता है।”दीनानाथ जी ने
उनकी आँखों में देखते हुए कहा,
वे कुछ पल रुके
“पचास साल पहले
जब इस हाथ को थामा था न, तब से आज तक कभी लगा ही नहीं कि मैं अकेला चल
रहा हूँ।” दीनानाथ जी ने कहा।
*****
सीमा भी अपने घर में अकेली
थी और उसका पति राजेश भी, इसलिए कोई चचेरा, ममेरा भाई या बहन भी नहीं
थे।इसके पहले वे लोग जिस शहर में रहते थे, मकान मालिक के छोटे बेटे को राखी बाँधकर आशा कितनी खुश हुई थी। इस शहर में वे
नये-नये आये थे। माँ को चुप देखकर आशा ने उसकी बाँह पकड़ कर हिलाई, तो अचानक जैसे उसे कोई
अनोखा हल मिल गया।
*****
रक्षाबंधन पर
हार्दिक शुभकामनाएँ
कभी समरभूमि में बहन ने, जय-तिलक संग राखी बाँधी
कभी संकट में इक पुकार पर, रिश्तों ने मर्यादा साधी !
इतिहास के पन्नों में मिलती, त्याग और साहस की कथाएँ
राखी की कच्ची डोरी ने, गढ़ डालीं कितनी गाथाएँ !
*****
पूरा डिब्बा वात्सल्य रस से सराबोर था
माँ ने सामने वाले माँ और
जिद करते बच्चे को देखा,
भूख से वह भी रो रहा था, कोई डांट-फटकार उसे चुप
नहीं करा पा रही थी,
भूखा है बच्चा तुम्हारा। कब
से देख रही हूं, ...
बुरा न मानो तो ये बचा दूध
उसे पिला दो,
दूसरी मां ने बिना ना-नुकुर
किए बच्चे के मुख में बोतल दे दी।
बच्चे की क्या जात?
*****
जुड़ी- सटी सब छत, मुँडेरें
आधी रातें, कथा- कहानी
खाट, दरी, बस चादर, तकिया
माटी-रची सुराही –पानी
*****
उसने
पूछा-मैं क्या हूँ तुम्हारी?
चुप होना ! -
उसका चुप होना
लगता है मानो
धरती का रुक जाना !
रंग सी है -
वह ज़िन्दगी के
कैनवास में
ख़ुशी के एक रंग सी है !
*****
नीचे एक पुरानी पर्ची दबी थी, पहली तनख्वाह से इन्होंनें खरीदी थी।
उसी क्षण समझ में आया दादी इत्र नहीं बचा रही थी,
उस दिन की खुशबू बचा रही थी,
जब उनके छोटे-से संसार ने पहली बार महकना
शुरू किया था।
*****
रवीन्द्र सिंह यादव
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