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मंगलवार, 11 अगस्त 2026

4831...सरगोशियों के स्वर

 मंगलवारीय अंक में

आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
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किसी के पक्ष में खड़ा हैं कोई ,
किसी का पक्ष लेकर आप भी खड़े हैं।
कोई नहीं समझता बात आपकी, 
आप भी तो ज़िद पर अपनी अड़े है।
हर सिक्के के हैं दो पहलू 
कोई चित है तो कोई पट भी होगा।
नज़रिया का खेल ये सारा,
स्वाभिमानी है तो कोई शठ भी होगा।
​कोई धूल-कंकड़,आँखों की किरकिरी कोई,
अक्ल पर सबकी ही एक से पत्थर पड़े हैं।
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आज की रचनाऍं-

"सरगोशियों के स्वर" विमोचन


आज की ये चर्चा बिलकुल अनौपचारिक थी जिसमें सबको खुलकर बोलने का अवसर मिला। साहित्य की यही विशेषता है कि वह वाचाल को मृदुभाषी और कम बोलने वाले को विचार व्यक्त करना सिखा देता है। सुशील सर के कारण आज ये सम्भव हो सका। चर्चा में सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय में भूगोल विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो ज्योति जोशी, साहित्यकार शम्भु राणा जी, डी आर डी ओ के वैज्ञानिक श्री हेमंत पांडे, पत्रकार जगदीश जोशी जी तथा डॉ पूरन जोशी भी शामिल रहे।



जेन अल्फा भारत की बेटी


एक स्त्री ही खड़ी हो गयी 
उस बेटी को क़ानूनी सबक़ सिखाने को 
धँसे गले से नज़र झुकाये आयी वीडिओ में 
सिटपिटाई-सी सार्वजनिक माफ़ी माँगने को
आत्मग्लानि से भर गया समूचा देश
देख क्रूर अट्टहास का वीभत्स परिवेश
विकृत राजनीति के समक्ष विवश-लाचार हुई प्रबुद्ध मानवता




मौन शिखर के महायोगी


शब्द जहाँ सब थम से जाते,

मंत्र स्वयं स्वर बनकर गाते,

शून्य स्वयं जिसकी वंदना करे, वह परम प्रमाण कौन।


कैलासों की नीरव चोटी,

जिससे पाती अमर ज्योति,

कण-कण में जो स्वयं प्रकाशित, वह अनंत अविराम कौन।



शक्ल ढाले हैं जिनके हर हर्फ़ में


अब ना और इम्तिहान ले ऐ ज़िन्दगी 

कोई समझता नहीं अश्क़ों की ज़ुबान

बिना आवाज़ रोने के दास्तान को 

समझता कहाँ है बेरहम ये जहान ।


दफ़्न होकर ही रह गईं ख़ामोशियों में 

जो मोहब्बत थी धड़कन ,एहसास में

लब की ज़ुबान से जो कह ना सकी  

तर कर ली ऐन की घटा के बरसात में ।


सन्ध्या का आलोक 



धागे सुलझते रहे और बातें भी। पता चला, उनका नाम सुमित्रा था। पास के वृद्धाश्रम में रहती थीं। वृद्ध का नाम रामनाथ था। उनकी पत्नी को गुज़रे कुछ वर्ष बीत चुके थे। उनकी सन्तान अपने कामों में इतना व्यस्त रहती थी कि उनका स्नेह-सम्मान भी अब मोबाइल की घंटियों में सिमट गया था। दोनों ने अपने-अपने दुःखों का ब्योरा नहीं दिया; शायद उसकी ज़रूरत भी नहीं थी। क्यों कि वे भविष्य की योजना बना रहे थे। आगे रामनाथ ऊन लाएँगे। फ़ौजियों-अनाथों के लिए स्वेटर तैयार होंगे। कुछ पीड़ाएँ शब्दों से नहीं, केवल उपस्थिति से पढ़ी जाती हैं।





दु:ख का कारण...अलक


नौकर ने अपनी ओढ़ी हुई चादर चोर को दे दी और बोला, 
इसमें बांध लो। उसे जगा देखकर चोर सामान छोड़कर भागने लगा। किन्तु नौकर ने उसे रोककर हाथ जोड़कर कहा,  भागो मत, इस सामान को ले जाओ ताकि मैं चैन से सो सकूँ। 


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।

4 टिप्‍पणियां:

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